जब जज ने फांसी की सजा सुनाते हुए शबनम को बताया ‘मजबूत दिल और गुर्दे वाली निर्मम औरत’

जब जज ने फांसी की सजा सुनाते हुए शबनम को बताया ‘मजबूत दिल और गुर्दे वाली निर्मम औरत’

बिल्लौरी आंखों वाली दुबली-पतली औरत का चेहरा इन दिनों रह-रहकर कौंध रहा है। उसका सिर दुपट्टे से ढंका हुआ है, और दबंग पुलिसवालों से घिरी हुई जैसे वो धरती में समा रही हो। ये शबनम है। वो औरत, जिसने 13 साल पहले अपने अम्मी-अब्बू समेत परिवार के 7 लोगों का कत्ल कर दिया। इनमें 11 महीने का एक बच्चा भी था, जिसका गला खुद शबनम ने घोंटा। जज ने फांसी की सजा सुनाते हुए शबनम को ‘मजबूत दिल और गुर्दे वाली निर्मम औरत’ कहा। अब शबनम की दया-याचिका भले ही टल जाए, या फिर वो 7 बार भी फांसी पर क्यों न लटका दी जाए- निर्मम औरत का पुछल्ला उसके साथ चलता रहेगा।

हो सकता है कि ‘मजबूत दिल-गुर्दे’ वाली 25 साल की शबनम ने ये सब सोचा हो और फिर हत्या करना उसे मुफीद लगा हो। हालांकि, उसने ये कतई नहीं सोचा होगा कि असलियत खुलने पर उसका जोशो-जुनून से भरा प्रेमी उसे ही दोषी बताने की कोशिश करेगा। जिसने साल 2008 में अमरोहा के इस नरसंहार के बारे में पढ़ा होगा, उसे याद होगा कि कैसे सलीम ने कत्ल के खुलासे के बाद सारा इल्जाम शबनम पर लगाने की कोशिश की थी। फक पड़ी शबनम पहले तो समझ ही नहीं पाई और जब तक समझ सकी, वक्त बीत चुका था। परिवार खत्म हो चुका था और हाथों की लकीरों में खून के पक्के दाग थे। शबनम को आज नहीं तो कल फांसी हो जाएगी। या फिर शायद उसकी सजा उम्रकैद में बदल जाए, लेकिन इसके बाद कई चीजें बदलने वाली हैं।

शबनम बालिग थी। 25 साल एक पकी उम्र होती है। प्रेमी भी कमोबेश इसी उम्र का था। होना तो ये चाहिए था कि परिवार को राजी करने की नाकाम कोशिश के बाद दोनों घर छोड़कर नया आशियाना बना लेते। शबनम स्कूल में पढ़ाती और सलीम सड़कें बनाता। ये रास्ता सही था, लेकिन शायद उतना आसान नहीं था। हो सकता था कि प्रेम में डूबी शबनम की स्कूल से घर लौटते हुए हत्या हो जाती। ये भी हो सकता था कि सलीम किसी रोज मर्दाने ईगो में घिरकर शराब की उल्टियां करता हुआ अपनी ही प्रेमिका पर हाथ उठा देता। ये नई बात नहीं। प्रेम में डूबकर घर से निकली लड़कियों के साथ अक्सर ये होता है। छोटे कस्बों से भागी हुई लड़कियां दिल्ली-मुंबई की किसी अंधेरी बस्ती में खाक हो जाती हैं। वे चाहकर भी छूटे हुए घर और टूटे रिश्तों के किवाड़ नहीं खटखटा पातीं।

शायद शबनम के कदम ने उत्तर प्रदेश के अमरोहा पर यही असर किया होगा। वहां की पढ़ी-लिखी लड़कियां प्रेम करने से भी डरें कि कहीं घरवाले उन्हें शबनम की तरह न देखने लगें। शबनम ने अंग्रेजी पढ़ी। भूगोल जैसा कोलंबस बना देने वाला विषय पढ़ा, लेकिन फेमिनिज्म और इंसानियत में कमजोर रह गई। अब जिंदा भी रहे तो शबनम की दुनिया जेल की कोठरी ही रहेगी।

छत्तीसगढ़ के ठेठ इलाकों में एक कहावत है- ‘आंजत-आंजत हुई कानी’। सौंदर्यबोध को चुभने वाली ये कहावत यहां सटीक बैठती है। बराबरी की बात करते हुए हम कहीं इतने लापरवाह न हो जाएं कि खंजन-नैन की चाह आंखों की रोशनी ही छीन ले।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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