संस्कार की खेती –(चिन्तन)

संस्कार की खेती –(चिन्तन)

आज सुबह बगीचे में खुरपी ले कर बैठ गई । मौसम का परिवर्तन हो रहा । अब कुछ नए फूल और -सब्जी के बीज बोने हैं । जमीन तैयार करनी है । इसके लिए सूखे पौधे और खरपतवार उखाड़ना है। …ये देखिये !!छुईमुई की पौध अपने कांटों सहित कितनी फैल गई । बिचारा पुदीना उसके नीचे दब कर सिकुड़ गया । पुदीना की पौध को उखाड़ कर दूसरे स्थान पर लगाया । तुषार के कारण तुलसी भी जल गईं , उसे उखाड़ना जरूरी हुआ ताकि उसी स्थान पर जो बीज गिरे हैं वे पुनः अंकुरित हो जाएं । अधिक ठंड के कारण कमल के फूल की जड़ भी गल जाती है ।इसलिए उसे उखाड़ कर नए बीज बो दिए ।
बिल्कुल इसी तरह प्रेम , सत्य, क्षमा आदि आध्यात्मिक गुण को पहले बोना नहीं पड़ता । क्योंकि इन की खेती नहीं होती । वास्तव में मन में काम , क्रोध , लोभ , अहंकार, असत्य, मूर्छा आदि का अभाव होने पर प्रेम , क्षमा सत्य , आदि आध्यात्मिक गुण स्वयमेव प्रगट होते हैं । जैसे खेत में से घास फूस आदि को उखाड़ना पड़ता है ताकि फसल अच्छी हो सके । वही बात इस मन के खेत में करनी पड़ती है। अंतर इतना ही है कि यहां उखाड़ने और बोने की क्रिया साथ-साथ चलती है । उखाड़ने की क्रिया ही बोने की क्रिया बन जाती है । क्योंकि मन की सभी क्रियाएं अबाध गति से होती है इसलिए काम को उखाड़ना ही प्रेम को बोना है , क्रोध को उखाड़ना क्षमा को बोना है, लोभ को उखाड़ना ही दया को बोना है । असत्यम ,अशिवम, असुन्दरम को उखाड़ना ही सत्यम शिवम सुंदरम को बोना है ।
कबीरदास के शब्दों में ,–
प्रेम न बाड़ी उपजे, प्रेम न हाट बिकाय ।
राजा -परजा जेहि रुचै , शीश देइ लै जाय।।
….प्रेम की प्राप्ति के लिए एक ही शर्त है –आत्मबलिदान , अहंकार का वध , स्वार्थ का वध , काम -क्रोध -लोभ -असत्य -मूर्छा का बहिष्कार होने पर ही प्रेम हृदय में प्रकट होता है।
किन्तु जब अनजाने ही काम -क्रोध -लोभ -अहंकार – असत्य -घृणा , को मन में बोया जाता है तो वह शीघ्र ही अपनी अपरिहार्य नियति को प्राप्त हो घृणा से हिंसा में बदल जाता है यही हिंसा परिवार में तथा समाज मे विद्रूपता उत्पन्न करती है ।
इसलिये बच्चों में संस्कार के बीज बोइये नहीं बल्कि असंस्कारी विचारों , अवगुणों को उखाड़ कर बाहर निकालिये। सदगुणों को पनपने के लिए बाल हृदय की जमीन तैयार करें
–डॉ निरूपमा वर्मा –

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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