
भागवत कथा के श्रवण से होता है पापों का होता है नाश—–आचार्य पुरूषोत्तम द्विवेदी जी महाराज
—–जैथरा के ग्राम परौली सुहागपुर में
भागवत कथा का हुआ समापन——-
एटा। जैथरा के ग्राम परौली सुहागपुर में बंजरग बली मंदिर प्रांगण में गुरुवार को भागवत सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा व महायज्ञ का आयोजन किया गया। मैनपुरी से आये आचार्य पुरूषोत्तम द्विवेदी जी महाराज 17 फरवरी से शुरुआत हुई जो 25 गुरुवार को समापन हुई। इस दौरान श्री महाराज ने कथा के पहले दिन श्रद्धालुओं को प्रवचन करते हुए कहा कि श्रीमद् भागवत कथा के वाचन व श्रवण से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ती हो जाती है। संसार दु:खों का सागर है। प्रत्येक प्राणी किसी न किसी तरह से दुखी व परेशान है। कोई स्वास्थ्य से दुखी है–कोई परिवार- कोई धन-तो कोई संतान को लेकर परेशान है। सभी परेशानियों से मुक्ति पाने के लिए ईश्वर की आराधना ही एकमात्र मार्ग है। इसलिए व्यक्ति को अपने जीवन का कुछ समय हरिभजन में लगाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भागवत कथा वह अमृत है- जिसके पान से भय-भूख- रोग व संताप सब कुछ स्वत: ही नष्ट हो जाता है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को मन बुद्धि चित एकाग्र कर अपने आप को ईश्वर के चरणों में समर्पित करते हुए भागवत कथा को ध्यानपूर्वक सुनना चाहिए। श्रीमद भागवत कथा का श्रवण करने से जन्म जन्मांतर के पापों का नाश हो जाता है। श्रीमद भागवत कथा के श्रवण से महापापी धुंधुकारी का भी उद्धार हो गया। कथा व्यास ने बताया कि धुंधुकारी अति दुष्ट था। उसके पिता आत्मदेव भी उसके उत्पातों से दुखी होकर वन में चले गए थे। धुंधुकारी वेश्याओं के साथ रहकर भोगों में डूब गया और एक दिन उन्हीं के द्वारा मार डाला गया। अपने कुकर्मों के फलस्वरूप वह प्रेत बन गया और भूख प्यास से व्याकुल रहने लगा। एक दिन व्याकुल धुंधुकारी अपने भाई गोकर्ण के पास पहुंचा और संकेत रूप में अपनी व्यथा सुनाकर उससे सहायता की याचना की। गोकर्ण धुंधुकारी के दुष्कर्मों को पहले से ही जानते थे, इसलिए धुंधुकारी की मुक्ति के लिए गया श्राद्ध पहले ही कर चुके थे। लेकिन इस समय प्रेत रूप में धुंधुकारी को पाकर गया श्राद्ध की निष्फलता देख उन्होंने पुन: विचार विमर्श किया। अंत में स्वयं सूर्य नारायण ने गोकर्ण को निर्देश किया कि श्रीमद्भागवत का पारायण कीजिए। उसका श्रवण मनन करने से ही मुक्ति होगी। श्रीमद् भागवत का पारायण हुआ। गोकर्ण वक्ता बने और धुंधुकारी ने वायु रूप होने के कारण एक सात गांठों वाले बांस के भीतर बैठकर कथा का श्रवण मनन किया। सात दिनों में एक-एक करके बांस की सातों गांठे फट गईं। धुंधुकारी भागवत के श्रवण मनन से सात दिनों में सात गांठे फोड़कर पवित्र होकर प्रेत योनि से मुक्त होकर भगवान के वैकुण्ठ धाम में चला गया। कथा के बाद प्रसाद के वितरण किया गया। प्रसाद ग्रहण करने के बाद श्रद्धालुओं ने आशीर्वाद प्राप्त किया। आयोजन को सफल बनाने में अनुज शर्मा पप्पी मिश्रा अनूप मिश्रा मनोज कुमार अखिलेश कुमार कल्लन शर्मा अनुज गुप्ता राहुल गिरि विशाल मिश्रा आदि ग्राम वासियों के सहयोग से सफल रहा।