गोलियों की गड्गडहाट मे हाई कोर्ट भी आया…

गोलियों की गड्गडहाट मे हाई कोर्ट भी आया…

एटा Conference की सामाजिक बड़ी पड़ताल

अभी 21दिसम्बर करीब शाम होने को थी और शहर का सबसे पुराने क्षेत्र मे गोलियों की दनादन गोलियों ने शहर को दिपावली होने का अहसास कराया था,परंतु यह गोलियां एटा के एक बड़े अधिवक्ता राजेन्द्र शर्मा व उनके परिवार के द्वारा पुलिस पार्टी पर चलाई ग़ई थी,जिसकी एक गोली मुस्लिम समुदाय के अरबाज खान को लगी थी, जिसका सिर्फ़ इतना दोष था कि उस राह निकल रहा था, खेर यह कहानी तो पुरे शहर को पता है और आपको भी….

परंतु….किंतु यहा से शुरू होता है जब मामले को एटा बार काउंसिल हाई कोर्ट लेकर गया और… फ़िर!

हाइ कोर्ट का कहना है कि उत्तर प्रदेश सरकार मे जंगलराज कायम है सरकार नाम की कोई चीज़ नही है, अब यह स्पष्ट नही हो पा रहा है कि कोर्ट ने पुलिस पर गोलियां चलने को लेकर कहा है या फ़िर पुर्वान्चल मे सरकार की कार्यवाहीयो को लेकर कहा है, फ़िलहाल कोर्ट को एक अधिवक्ता को अरेस्ट करने तक का तो मालुम है लेकिन 21दिसम्बर को राजेन्द्र शर्मा द्वारा चलाई गयी गोलियो की आवाज शायद ना सुनाई दी हो.. क्युकि दुरी भी बहुत है?

पिछले दिनो से जिले के अधिवक्ता पुरे जोश के साथ अपने कार्यो से विरत पर है …लेकिन क्या सभी अधिवक्ताओ को यह सोच है कि क्या वह सामाजिक न्याय की बाकई पैरवी कर रहे हैं, अगर सही है तो फ़िर पुलिस ने एसे कइ हजार मुक्कदमे सिर्फ़ बिना अपराधी के चेहरे को देखे चार्जसीट फ़ाइल की है,क्या बिना पैसे के लड़ना नही था…

मुस्लिम समुदाय की चुप्पी भी डरती है

अगर समय रहते उस समय पुलिस बडा कदम नही उठाती तब शायद पुरे शहर को बडा जोखिम उठाना पड़ता,परंतु यही मुस्लिम समुदाय जो काबा उठाने के लिये हजारो की संख्या मे खड़े होते हैं लेकिन एक मुस्लिम घायल के लिये इन्साफ़ पर चुप है आखिर क्यु……???

पत्रकारो पर लिखे मुक्कदमे भी वापिस होने चाहिये फ़िर….

अभी हाल ही मे एक प्रकरण की खबर कबरेज करने गये दीपक पंडित पत्रकार को सिर्फ़ महज इस बात के लिये बारह धाराओ मे जेल भेज दिया कि एक लेखपाल की खबर को कबर करने क्यु गया,जब कि अपराध इतना भी नहीं था बस यह पूछ लेना कि बन्द दरवाजे मे आखिर लेखपाल किस चारमिनार का नक्सा बना रहे थे, SDM अबुल कलाम जो खुद को पाच टाइम की नवाज का इंसान बोलते हैं वह भी झूठ बोल गये कि दीपक पत्रकार ने लेखपाल को मारा,…

अब यह देखना है कि राजेन्द्र शर्मा के प्रकरण मे पुलिस गोलिया खाकर अपने रुख से पलटती है या फ़िर उस घायल के आधार पर उन गोलियो की दहशत को चार्जसीट के पन्नों मे उतार कर न्यायालय को पेश करेगे,

फ़िलहाल न्यायालय पर पुरा भरोसा है कि गोलियो की दहशत क्या है….

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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