73 वें निरंकारी संत समागम पर सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने मानवता को दिया संदेश

73 वें निरंकारी संत समागम पर सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने मानवता को दिया संदेश
परमार्थ को अपनाकर ही मानव का आचरण एवं व्यवहार स्थिर होगा:-सुदीक्षा जी महाराज
एटा– मानव भौतिक साधन के पीछे भागने के बजाय मानवीय मूल्यों को अपनाने की ओर ध्यान केंद्रित करेगा तो जीवन स्वयं ही सुंदर बन जाएगा।
यह उद्गार सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने तीन दिवसीय 73 वें वर्चुअल निरंकारी संत समागम के माध्यम से कहे। वर्चुअल रूप में आयोजित निरंकारी संत समागम का आनंद विश्व भर में फैले लाखों निरंकारी श्रद्धालु प्रभु भक्त प्रेमियों ने ऑनलाइन के माध्यम से निरंकारी मिशन की वेबसाइट एवं संस्कार टीवी के माध्यम से सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज के पावन वचनों को श्रवण किया। जिसमें ब्रांच एटा के निरंकारी भक्तों ने भी अपनी भागीदारी ली।
सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के संक्रमण के विषय में बताते हुए कहा इस नकारात्मक वातावरण में संसार ने यह जाना जिस माया के पीछे वह भाग रहे हैं सही अर्थ में तो वह तुच्छ साधन मात्र है। और इनका साधन के रूप में ही प्रयोग किया जाना चाहिए। मानव अपने दैनिक कार्यों में इतना व्यस्त हो जाता है कि अपने परिवार को समय ही नहीं दे पाता। इन सभी भौतिक वस्तुओं के पीछे मनुष्य अपना सुख चैन तक खो देता है। इस विकट परिस्थितियों में सभी ने यह देखा कि लोग किस प्रकार से स्वार्थ से परमार्थ की दिशा की ओर बढ़ रहे हैं जिसे भी जिस रूप में जरूरत हुई चाहे वह व्यक्तिगत रूप हो या किसी संस्था के माध्यम द्वारा उसे उसी रूप में सहायता दी गई।
इस अभियान में संत निरंकारी मिशन का महत्वपूर्ण योगदान रहा। सीमित दायरे में केवल स्वयं के लिए न सोच कर समस्त संसार को अपना माना। विश्व बंधुत्व एवं दीवार रहित संसार का उदारचरित्र भाव मन में रखकर हर जरूरतमंद को अपने सामर्थ्य अनुसार मदद की। स्वयं की पीड़ा को भूल कर दूसरे की पीड़ा का निवारण करने का प्रयास किया। इन विषम परिस्थितियों में मानवीय मूल्य ही काम आए। लोगों की मदद करके सच्चे अर्थों में मानव मानव कहलाया और यह साबित किया मानवता की सेवा ही परम धर्म है।
सतगुरु माता सुदीक्षा जी ने कहा कि संसार को निरंकार द्वारा सर्वोत्तम उपहार मानवता के रूप में प्राप्त हुआ है। प्राचीन काल से ही संतो ने यही समझाया कि इस भौतिक माया को इतना महत्व न दें कि जीवन में इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। भौतिक साधनों को महत्व न देकर मानवीय मूल्यों को महत्व देना चाहिए जैसे प्रेम, नम्रता, सेवा, सहनशीलता आदि दिव्य गुणों को अपनाकर ही हम अपने जीवन को उज्जवल कर सकते हैं। इन दिव्य गुणों को जीवन में अपनाकर एकत्व के भाव का आगमन होता है। और हमारे आचरण और व्यवहार में स्थिरता आ जाती है। जब परमात्मा की अनुभूति होती है तब स्थिर से मन का नाता जुड़ जाता है। और जीवन सरल सहज बन जाता है। फिर माया रूपी भौतिक वस्तुओं को केवल एक जरूरत समझते हुए उस ओर अपना ध्यान आकर्षित नहीं करते। केवल परमार्थ अर्थात सेवा परोपकार ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य बन जाता है।
अंत में सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने श्रद्धालु भक्तों को प्रेरित करते हुए कहा परमात्मा के साथ एकत्व का नाता गहरा करते जाएं जिससे जीवन में स्थिरता प्राप्त हो। जिससे दिलों में प्रेम बढ़ता जाए। आपने कहा हमें किसी स्वार्थ या मजबूरी के कारण नहीं बल्कि इसलिए प्रेम का मार्ग अपनाना चाहिए क्योंकि वही एक उत्तम मार्ग है जिसके द्वारा समस्त संसार में मानवता स्थापित की जा सकती है।

About The Author

निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

Learn More →

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

अपडेट खबर के लिए इनेबल करें OK No thanks