
दुनिया की सबसे प्यारी चीज एक हंसते हुए छोटे से बच्चे का चेहरा है. सोचिए अगर इस चेहरों को मौत ज़िंदगी के 20 दिन बाद ही चुग ले. मां इतनी असहाय हो कि वो एक आखिरी बार अपनी भीगी छाती से बच्चे को भींचकर रो भी न सके. बाप और घर के लोगों को इसे एक आखिरी बार देखकर पुचकार पाने का हक तक न मिल सके. कोरोना ने मौत को बेजान पुतलों से भी ज्यादा डरावना कर दिया है.
पीपीई सूट में एंबुलेंस ड्राईवर के साथ 20 दिन के मासूम का शव अपने हाथ में लिए अब्दुल मॉर्चरी अधिकारियों से कहता है कि यह मेरा ही बच्चा है। अब्दुल के मुंह से सिर्फ एक ही शब्द निकल पाता है- ‘सुहान’। वह उसका पहला बच्चा था जो एक प्रोटेक्टिव मेडिकल कवर में लिपटा हुआ किसी सफेद कागज के पन्ने की तरह दिख रहा था।
विलाप का यह क्षण सदियों से अंतिम सांसों के साक्षी भाव रहेगा . रोना प्राकृतिक है. सदा से है. ज़रूरी भी है. लेकिन रोते हुए चेहरे अब और अधिक असहाय हैं. यह कैसी त्रासद स्थिति है कि संक्रमण में घर के लोग न माथे पर पट्टी बदल सकते, न नब्ज़ पर हाथ रख सकते. न दवा, न पानी का सहारा. एक स्पर्श, स्पंदन या गर्माहट तक नहीं. और भय में जीवन मांगती आंखें जब मौत में समा जाएं तो न मृतक को स्नान, न कंधा, न अर्थी, न मिट्टी, न विदा. कोरोना से ज़्यादा कितनी ही बीमारियां रोज़ लोगों को निगल रही हैं. लेकिन मौत का इतना असहाय स्वरूप सच में इस सदी का अबतक का सबसे डरावना सच है. सवाल अब ये उठता है कि क्या खौफ में जी रहे लोग मरने की आसानी भी मांगना छोड़ दें?