खरी – अखरी
इस बार उपराष्ट्रपति वैंकेया नायडू ने उठाई न्यायपालिका के निर्णयों पर उंगली

क्या न्यायमूर्तिगण इसे न्यायपालिका की अवमानना मानने का साहस दिखा पायेंगे
या यूं ही चलता रहेगा सबलों के सामने घुटनाटेक और निर्बलों की छाती में सवार । ग़रीब की लुगाई सारे गांव की भौजाई का खेल
वकील के ट्यूट, पत्रकार की रिपोर्टिंग उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्तियों को न्यायालय की अवमानना लगती है । उच्चतम न्यायालय की अस्मिता को ख़तरा पैदा होने लगता है । उच्चतम न्यायालय की गरिमा धूमिल होने लगती है । उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति स्वमेव संज्ञान लेकर अपनी ही बनाई व्यवस्था को ठेंगा दिखा कर ताबड़तोड़ सुनवाई करते हुए अपने अहम की तुष्टि के लिए सज़ा सुना देते हैं ।
मगर जब संवैधानिक पद पर बैठा हुआ कोई व्यक्ति जब न्यायपालिका पर टिप्पणी करता है तो उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्तियों को सांप सूंघ जाता है । सीजेआई तक की हिम्मत नहीं होती कि वे उस व्यक्तव्य की निंदा तक कर सकें न्यायालय की अवमानना मानकर केस दायर कर सुनवाई करना तो दूर की कौड़ी है ।
देश देख रहा है कि एक ओर तो ख़ास लोगों के केस के लिए अवकाश दिवस हो या आधी रात न्यायमूर्ति कोर्ट खोलकर सुनवाई कर लेते हैं तत्काल ख़ास आदमी के पक्ष में फैसला भी सुना देते हैं वहीं दूसरी ओर आम लोगों के केसों की लम्बी कतार है जिनकी सुनवाई नहीं हो रही है, लोग जेलों में बंद हैं । ज़मानत मिलना तो दूर ज़मानत अर्जी पर सुनवाई तक नहीं की जा रही है ।
न्यायमूर्तियों द्वारा दिये जा रहे फैसले जब सत्तापक्ष के मनमाफ़िक दिखाई देंगे तो न्यायालय और न्यायमूर्तियों की नीयत पर सवाल तो उठेंगे ही । आम आदमी के संवैधानिक अधिकारों को रौंदे जाने पर जब न्यायपालिका आंख मूंदेगी तो उंगली भी उठेगी ही । इस पर यदि न्यायमूर्तिगण को न्यायालय की अवमानना लगती है तो यह न्यायमूर्तिगणों के अहम का तुष्टिकरण ही कहा जायेगा ।
न्यायपालिका की अवमानना का ताजातरीन उदाहरण सामने आया है गुजरात के केवडिया से जहां देश के उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच सौहार्दपूर्ण समन्वय – जीवंत लोकतंत्र की कुंजी विषय पर अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों के 80वें सम्मेलन को संबोधित करते हुए पटाखों और जजों की नियुक्ति में कार्यपालिका को भूमिका देने सहित कई मामलों पर दिये गए निर्णय को न्यायपालिका का हस्तक्षेप बढ़ना क़रार दिया है । उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू का यह व्यक्तव्य खुलेतौर पर न्यायपालिका और न्यायमूर्तिगणों पर सवालिया निशान लगाता है ।
देखना दिलचस्प होगा कि वकीलों और पत्रकारों की हक़ीक़त भरी टिप्पणियों को न्यायालय के अस्तित्व पर संकट, न्यायालय की अवमानना मानने वाले न्यायमूर्तिगण ख़ासतौर पर सीजेआई उपराष्ट्रपति वैंकेया नायडू द्वारा न्यायपालिका के निर्णयों पर की गई टिप्पणी पर स्वतः संज्ञान लेकर न्यायपालिका की अवमानना मानकर सुनवाई करने का साहस दिखा पायेंगे या यूं ही चलता रहेगा सबलों के सामने घुटनाटेक और निर्बलों की छाती में सवार । ग़रीब की लुगाई सारे गांव की भौजाई ।