मिशन शक्ति के अंतर्गत बौद्धिक अशक्त महिलाओं एवं बालिकाओं के परिजनों के साथ जनपद भर में हुई बैठक,

एटा

मिशन शक्ति के अंतर्गत बौद्धिक अशक्त महिलाओं एवं बालिकाओं के परिजनों के साथ जनपद भर में हुई बैठक, ऐसे अशक्त बच्चों की माताओं को मिलेगा विशेष पुलिस अधिकारी का दर्जा, बैठक कर दिलाया भरोसा कि पुलिस उनके बाद भी उनके बच्चों की करेगी सुरक्षा बौद्दिक रूप से निशक्तजन समाज का एक महत्वपूर्ण अंग हैं, जिनको जीवन पर्यन्त सुरक्षा प्रदान करना पुलिस का महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व है। बौद्धिक रूप से निशक्त लोगों के साथ कई तरह के अपराध घटित होते हैं (खासकर इनके माता-पिता की मृत्यु के बाद), जैसे कि इनकी ट्रैफिकिंग उपरांत इनके अंगों (आँखों, किडनी आदि) का व्यापार (organ-harvesting), इनसे जबरदस्ती भीख मंगवाने का कार्य, लैंगिक शोषण, अन्तराष्ट्रीय सीमाओं पर इनके द्वारा ड्रग-पेडलिंग कराया जाना, इनकी ज़मीनों पर अवैध कब्ज़ा, आदि। इनके माता-पिता को यह भय हमेशा सताता रहता है कि आखिर उनकी मृत्यु उपरांत उनके बच्चों की सुरक्षा कौन करेगा। हालाँकि इनके प्रति होने वाले अपराधों का कोई राष्ट्र-व्यापी पृथक आंकड़ा नहीं है परन्तु कई रिपोर्टों एवं संकलित मीडिया कवरेज के अनुसार स्थिति बेहद ही गंभीर है: . यूपी 112 के मात्र 1 वर्ष के आंकड़े यह दर्शाते हैं कि बौद्धिक अशक्तों पर स्थानीय लोगों द्वारा होने वाले अत्याचारों के संबंध में प्राप्त कॉल्स की संख्या 5000 से भी अधिक है। यह वो आंकड़े हैं जिन्हें किसी अन्य व्यक्ति द्वारा यूपी 112 को हो रहे अत्याचार के बारे में बताया गया है क्योंकि प्रायः बौद्धिक अशक्त स्वयं अपने से पुलिस को सूचना देने में सक्षम नहीं होते। हम बेहतर अंदाज़ा लगा सकते हैं कि असलियत में समस्त अत्याचारों के आंकड़े क्या हो सकते हैं। चूंकि अधिकतर बौद्धिक अशक्त महिलायें यह नहीं जान पाती कि बिना सहमती सेक्स एक जघन्य अपराध है और इसकी रिपोर्ट पुलिस को करनी होती है इसलिए अक्सर इस तरह के अपराध की एफआईआर दर्ज नहीं हो पाती है। इन्टरनेट पर विभिन्न मीडिया दवारा वर्णित भारत में 2009 से अब तक बौद्धिक अशक्त महिलाओं से रेप की 37 घटनाएं उपलब्ध हैं जिनमे से 26 घटनाएं मात्र वर्ष 2018 और 2019 की हैं। कुल 8 घटनाएं उत्तर प्रदेश की हैं। इन सभी प्रकार के अपराधों पर रोक लगाने के लिए पुलिस की महत्वपूर्ण भूमिका है खासकर इनके परिवारजनों से बिछड़ने के पूर्व। अतः इसी चुनौती को स्वीकार करते हुए जनपद एटा में मिशन शक्ति के अंतर्गत बौद्धिक अशक्तों की माताओं को विशेष पुलिस अधिकारी बनाकर सशक्त किया जा रहा है साथ ही थाना स्तर पर उनका पंजीकरण कराया जा रहा है ताकि थाना पुलिस द्वारा उनके बच्चों की जीवन पर्यंत देखभाल का पुनीत कार्य किया जा सके। थानों पर इनका रिकॉर्ड होने से हम इनकी समस्याओं को बेहतर तरीके से निपटा सकेंगे। इस कार्य से उनके बच्चों के साथ होने वाले अपराधों में भारी कमी आएगी और साथ ही उनके माता-पिता को जो यह चिंता रहती है कि उनकी मृत्यु उपरांत उनके बच्चों की कौन देखभाल करेगा, उस चिंता का भी निराकरण हो जायेगा। बौद्धिक अशक्तों के माताओं को विशेष पुलिस अधिकारी की उपाधि से सम्मानित करने से न केवल उनका सामाजिक स्तर ऊंचा होकर उन्हें सशक्त करेगा, बल्कि शरारती तत्वों की भी रोकथाम करेगा जो कि उनके बच्चों के लिए एक टीके जैसा होगा। इस प्रकार इन 'अदृश्य लोगों को 'दृश्यमान' बनाने से हम न केवल विभिन्न अपराधों को होने से पहले ही रोक पाएंगे बल्कि उन लोगों को और अधिक आत्मनिर्भर और शायद और ज्यादा सुखी बना पाएंगे। जनपद के थानों द्वारा उक्त वर्णित कार्य निम्न तरीके से किया जा रहा है:

1. चिन्हांकन – हमारे पुलिसकर्मी प्रत्येक गाँव में जाकर मानसिक निशक्तों को चिंहित कर रहे हैं। इस कार्य को हल्का सब-इंस्पेक्टर्स और बीट-कांस्टेबलस स्वयं कर रहे हैं जिसमे ये ग्राम-प्रधान, कोटेदार, शिक्षा-मित्र, आशा-वर्कर, आदि की मदद ली जा रही हैं।
2. अभिलेखीकरण- उक्त प्रारूप में एकत्रित की गयी सूचना को प्रत्येक थाने में एक रजिस्टर में ग्राम-वार अंकित किया जा रहा है।
3. नियमित निगरानी- जैसे कि हम flysheet के माध्यम से अपराधियों पर नज़र रखते हैं वैसे ही हमारे हल्का सब-इंस्पेक्टर्स एवं बीट कांस्टेबलस को माह में एक बार इनकी कुशलता के बारे में ज्ञात करते रहेंगे।
अबतक जनपद में कुल 1986 ऐसे परिवार चिह्नित किये जा चुके हैं जिनमें एक या उससे अधिक बौद्धिक अशक्त व्यक्ति है। प्रत्येक थाने में इनकी माताओं को बुला कर इन्हें सम्मानित करने का कार्य किया जा रहा है। साथ ही एक समर्पित टीम द्वारा गाँव-गाँव जा कर इन्हें विशेष पुलिस अधिकारी की उपाधि भी प्रदान की जा रही है।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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