
‘ आला हज़रत इस्लामिक विद्वान के साथ
समाज सुधारक थे।
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कानपुर/ ख़ानकाहे हुसैनी में आशिके रसूल आला हजरत इमाम अहमद रजा खाँ का 102 वां उर्स मुबारक़ अक़ीदत सादगी के साथ मनाया गया ज़ोहर की नमाज़ के बाद ख़ानकाहे हुसैनी हज़रत ख्व़ाज़ा सैय्यद दाता हसन सालार शाह (रह अलै0) की दरगाह का गुस्ल संदल, इत्र केवड़ा से कर गुलपोशी की गयी।उर्स की शुरुआत तिलावते कुरानपाक से हाफिज कफ़ील हुसैन ख़ान ने की नात मनकबत में हाजियों आओ शहंशाह का रौज़ा देखो, काबा तो देख लिया काबे का काबा देखों, गौर से सुन लो रजा काबे से आती है सदा मेरी आँखों से मेरे प्यारे का रौज़ा देखो। ख़ानकाहे हुसैनी के साहिबे सज्जादा इख़लाक अहमद डेविड चिश्ती ने कहा आला हजरत अहमद रजा खाँ ने इल्म का जाम इतनी शिद्दत के साथ पिया कि देश-विदेश का मुस्लिम जगत उनका कायल हो गया अब के उलमा ने उन्हें मुजद्दिद की उपाधि से नवाजा दीनी और दुनियाबी इल्म की बदौलत ही वे दुनिया भर में आला हजरत के नाम से जाने गए तेरह साल की उम्र में मुफ्ती बन गये उर्दू , अरबी, फारसी के अलावा हिंदी, गणित, विज्ञान
समेत कई विषयों पर उनकों महारथ हासिल थी वह एक महान इस्लामिक विद्वान न्यायविद तथा महान समाज सुधारक थे, उन्होंने कानून, धर्म, दर्शन तथा विज्ञान विषयों पर अनेक पुस्तकों की रचना की। उर्दू में कुरान शरीफ़ का अनुवाद कर कंजुल ईमान लिखी जो दुनियाभर में मशहूर है दीन और इल्म की ख़िदमत में पूरी ज़िदगी गुज़ारी आशिके रसूल आला हजरत सुन्नियत के बड़े आलमबरदार बने उन पर उनके पीर को भी नाज़ था उनके पीर सैय्यद आले रसूल फ़रमाते है कि अगर कयामत के रोज़ खुदा उनसे पूछेगा कि दुनिया से मेरे लिए क्या लेकर आया है तो अपनी इबादत रियात पेश नही करुंगा बल्कि खुदा की बारगाह में अहमद रजा को पेश कर दूंगा। अल्लाह और रसूले खुदा से मोहब्बत करना व सुनतों पर अमल कैसे किया जाता है वो उन्होंने पूरी दुनियां को बताया। खिताब के बाद 2 बजकर 38 मिनट पर कुल शरीफ की आखिरी रस्म अदा की गयी। दुआ में अल्लाह की बारगाह में रसूले खुदा, मौला अली गरीब नवाज के सदके व उर्स की बरकत से हमारे मुल्क को वहशीपन हरकतों से बदनाम करने वालों पर कुदरती कहर नाजिल कर।