
बरेली। अलंकार अग्निहोत्री प्रकरण अब केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई भर नहीं रह गया है, बल्कि यह न्याय, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रशासनिक गरिमा से जुड़ा गंभीर मुद्दा बनता जा रहा है। जिस तेजी से उनके समर्थन में भीड़ बढ़ रही है, वह इस बात का संकेत है कि समाज का एक बड़ा वर्ग इस पूरे घटनाक्रम को अन्यायपूर्ण और जल्दबाज़ी में लिया गया फैसला मान रहा है।
स्थिति यह है कि अलंकार अग्निहोत्री को प्रशासन ने कथित रूप से हाउस अरेस्ट कर रखा है और समर्थकों से मिलने तक नहीं दिया जा रहा। यह कदम न केवल असामान्य है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की भावना के भी विपरीत प्रतीत होता है। इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि उनके इस्तीफे को औपचारिक रूप से स्वीकार या उस पर विचार करने के बजाय, प्रशासन ने आनन-फानन में बर्खास्तगी की कार्रवाई कर दी। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या एक वरिष्ठ अधिकारी को अपनी बात रखने और संवैधानिक तरीके से असहमति दर्ज कराने का अधिकार भी नहीं है।
अलंकार अग्निहोत्री के समर्थन में अब केवल आम नागरिक ही नहीं, बल्कि विभिन्न हिंदू और धार्मिक संगठन भी खुलकर सामने आ चुके हैं। यह समर्थन किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, बल्कि उस भावना के लिए है जिसमें यह विश्वास है कि UGC कानून और शंकराचार्य जैसे सम्मानित धार्मिक पदों के कथित अपमान पर सवाल उठाना अपराध नहीं होना चाहिए। भारतीय हिंदू परिषद के मंडल अध्यक्ष पंकज पाठक का पहले दिन से ही मैदान में उतरना इस आंदोलन को और मजबूती देते दिख रहे है।
प्रशासन भले ही पूरे घटनाक्रम और समर्थकों पर कड़ी नजर बनाए हुए हो और किसी भी स्थिति के लिए तैयार रहने की बात कर रहा हो, लेकिन यह भी सच है कि अलंकार अग्निहोत्री के समर्थक अब पीछे हटने के मूड में नहीं हैं। वे स्पष्ट रूप से UGC कानून से जुड़े विवाद और शंकराचार्य के अपमान के दोषियों पर कानूनी कार्रवाई की मांग पर अड़े हुए हैं।
यह पूरा प्रकरण आने वाले समय में एक बड़े सामाजिक और राजनीतिक विमर्श का रूप ले सकता है। सवाल केवल इतना नहीं है कि आगे क्या होगा, बल्कि यह भी है कि क्या प्रशासन संवैधानिक मूल्यों और निष्पक्षता के साथ इस मामले को संभाल पाएगा। फिलहाल, इतना तय है कि अलंकार अग्निहोत्री का मामला अब दबाया नहीं जा सकता—यह जनभावनाओं से जुड़ चुका है और इसका समाधान भी पारदर्शिता और न्याय के रास्ते से ही निकल सकता है।