
प्रधानमंत्री द्वारा GST सुधारों की घोषणा एक स्वागतयोग्य कदम है। आठ साल बाद यह साफ हो गया है कि बहु-स्लैब टैक्स व्यवस्था ने न तो कारोबारियों को राहत दी, न ही उपभोक्ताओं को। अब समय है कि टैक्स ढाँचे को सरल और न्यायपूर्ण बनाया जाए।
पहला कदम होगा स्लैबों की संख्या घटाना। केवल दो मुख्य दरें—5% और 18%—पर आधारित संरचना से स्पष्टता आएगी। रोजमर्रा की वस्तुएं, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्टेशनरी 0–5% के दायरे में आएँ, जबकि उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुएँ (AC, TV, फ्रिज आदि) 18% में। विलासिता और हानिकारक वस्तुएँ (शराब, तंबाकू) पर विशेष 40% टैक्स लगाया जा सकता है।
दूसरा कदम होगा बुनियादी ज़रूरतों को टैक्स-फ्री करना। बिजली–पानी के बिल, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और ऑनलाइन शिक्षा पर GST पूरी तरह खत्म हो। इससे सीधी राहत आम नागरिक को मिलेगी और सामाजिक-आर्थिक न्याय की दिशा में ठोस पहल होगी।
तीसरा कदम छोटे कारोबारियों को राहत देना है। GST पंजीकरण की सीमा ₹40 लाख से बढ़ाकर कम से कम ₹75–99 लाख करनी चाहिए। इससे लाखों कारीगर और व्यापारी कागज़ी बोझ से मुक्त होंगे।
चौथा कदम भविष्य की ओर देखना है। नवीकरणीय ऊर्जा उपकरणों पर न्यूनतम (0–1%) GST तय किया जाए। इससे हरित ऊर्जा और आत्मनिर्भरता दोनों को बल मिलेगा। साथ ही, सस्ते मकानों पर 1–3% टैक्स दर से शहरी मध्यवर्ग और निम्नवर्ग को घर खरीदने का अवसर मिलेगा।
लेकिन कर सुधार सिर्फ तकनीकी बदलाव का सवाल नहीं है। यह इस बात का भी प्रश्न है कि टैक्स का बोझ किस पर पड़े। वर्तमान व्यवस्था में बोझ सबसे अधिक उस वर्ग पर है जो श्रम और उत्पादन करता है—मजदूर, किसान, शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियर। जबकि पूँजी और सट्टा-आधारित मुनाफों पर अपेक्षाकृत कम कर लगता है। यही असमानता समाज में गहरी खाई पैदा करती है।
टैक्स नीति का नैतिक सिद्धांत स्पष्ट होना चाहिए:
- उत्पादक श्रम की आय (वेतन, खेती, कारीगरी) पर न्यूनतम कर।
- अनुत्पादक लाभ की आय (जमीन-जायदाद की कृत्रिम महँगाई, शेयर बाज़ार का सट्टा, डिजिटल विज्ञापन राजस्व) पर उच्च कर।
इससे न केवल कर प्रणाली न्यायपूर्ण होगी, बल्कि पूँजी को वास्तविक उत्पादन और नवाचार की ओर मोड़ा जा सकेगा।
भारत की कर व्यवस्था को सरलता और न्याय के इस संतुलन की ओर बढ़ना ही होगा। तभी नागरिकों को लगेगा कि उनसे कर वसूली सिर्फ सरकार के खज़ाने के लिए नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक भलाई और समानता के लिए हो रही है।