बिहार में मतदाता सूची का ‘सघन पुनरीक्षण’: पारदर्शिता बनाम अधिकार का सवाल

बिहार में मतदाता सूची के सघन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई और मीडिया कवरेज ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सर्वोच्च न्यायालय में चल रही सुनवाई और उसके निर्णयों से यह स्पष्ट होता है कि यह मामला केवल तकनीकी प्रक्रिया का नहीं, बल्कि चुनावी पारदर्शिता, संवैधानिक संस्था की स्वायत्तता और आम नागरिक के मतदान अधिकार से जुड़ा हुआ है।

सुनवाई का मूल मुद्दा क्या है?

शुरू से ही यह मामला एसआईआर की वैधता और आवश्यकता पर केंद्रित था। याचिकाकर्ताओं ने इस प्रक्रिया को चुनौती देते हुए कहा था कि:

  1. यह कानूनी रूप से वैध नहीं है।
  2. इसकी कोई विशेष आवश्यकता नहीं थी, जबकि सामान्य पुनरीक्षण प्रक्रिया पहले से ही चल रही थी।
  3. इसके लिए दिया गया समय अपर्याप्त था।

लेकिन, मीडिया रिपोर्ट्स से ऐसा प्रतीत होता रहा कि सुनवाई एसआईआर की प्रक्रिया और तरीकों पर हो रही है, न कि उसकी वैधता पर। न्यायालय ने चुनाव आयोग से हटाने गए 65 लाख मतदाताओं के नाम सार्वजनिक करने और हटाने का कारण बताने का निर्देश दिया है। यह कदम, भले ही पारदर्शिता की दिशा में हो, लेकिन यह सवाल खड़ा करता है कि क्या यह आदेश एसआईआर की वैधता पर अंतिम निर्णय आने से पहले ही उसकी प्रक्रिया को स्वीकार कर रहा है?

जीवित मतदाताओं को मृत घोषित करना: एक गंभीर त्रुटि

एसआईआर प्रक्रिया में हुई गंभीर त्रुटियों का सबसे बड़ा प्रमाण वे दो लोग हैं, जिन्हें मृत घोषित किए जाने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट में पेश होना पड़ा। यह घटना पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है। यदि एक जीवित व्यक्ति को केवल कागजी कार्रवाई के आधार पर मृत घोषित किया जा सकता है, तो क्या यह प्रक्रिया लाखों अन्य मतदाताओं के नामों के साथ भी मनमानी नहीं कर सकती?

  • यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सभी हटाए गए नामों के लिए मृत्यु प्रमाण पत्र जैसे पुख्ता दस्तावेज मौजूद हैं?
  • यदि नहीं, तो किस आधार पर लाखों लोगों को मृत मान लिया गया?
  • क्या चुनाव आयोग से इस गंभीर गलती के लिए कोई जवाबदेही तय की गई है?

यह स्थिति तब और भी चिंताजनक हो जाती है, जब नाम जोड़ने के लिए आधार जैसे कई दस्तावेज़ों की माँग की जाती है, लेकिन नाम हटाने के लिए ऐसी सख्ती नहीं दिखती। यह दोहरा मापदंड आम मतदाता में अविश्वास पैदा करता है।

संवैधानिक संस्था की स्वायत्तता और जवाबदेही

चुनाव आयोग एक स्वतंत्र और संवैधानिक संस्था है। लेकिन, उसकी स्वायत्तता का अर्थ यह नहीं है कि वह मनमानी कर सके। जब उसके मुखिया की नियुक्ति पर ही सवाल खड़े हो रहे हों, तो उसके फैसलों की समीक्षा होनी ही चाहिए।

  • चुनाव आयोग का यह तर्क कि “वह एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है और तमाम जानकारी सार्वजनिक करने के लिए बाध्य नहीं है,” अपने आप में विरोधाभासी है।
  • जनतंत्र में कोई भी संस्था जनता के प्रति जवाबदेह होती है। पारदर्शिता और जवाबदेही ही उसकी विश्वसनीयता का आधार होती हैं।
  • इस मामले में आयोग की जिद और उसकी प्रक्रियाओं में दिखाई गई खामियों से यही सिद्ध होता है कि अधिकार के साथ-साथ कर्तव्यों का भी पालन आवश्यक है।

लोकतंत्र में विश्वास की परीक्षा

सर्वोच्च न्यायालय का नाम और कारण सार्वजनिक करने का आदेश एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन यह मतदाता सूची में हुई अनियमितताओं के मूल कारण को संबोधित नहीं करता। जब तक एसआईआर की वैधता पर अंतिम निर्णय नहीं हो जाता, तब तक यह प्रक्रिया लोकतंत्र के लिए एक खतरा बनी रहेगी। यह मामला इस बात की ओर भी इशारा करता है कि राजनीतिक दल और मीडिया किस तरह से इस संवेदनशील मुद्दे को प्रस्तुत करते हैं।

यह ज़रूरी है कि सर्वोच्च न्यायालय केवल प्रक्रिया में सुधार का आदेश न दे, बल्कि एसआईआर की वैधता और चुनाव आयोग के अधिकारों की सीमा पर भी स्पष्ट और निर्णायक फैसला सुनाए। तभी लोकतंत्र में आम नागरिक का विश्वास सुनिश्चित हो सकेगा।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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