
एटा।
सहकारी समितियों में खाद वितरण एक बार फिर अव्यवस्था और लापरवाही का पर्याय बन गया है। ताजा मामला अलीगंज तिराहे पर स्थित क्षेत्रीय सहकारी समिति का है, जहां बुधवार को खाद वितरण के दौरान मची भगदड़ में कई महिलाएं जमीन पर गिरा दी गईं। हालात इतने बेकाबू हो गए कि महिलाओं के साथ धक्का-मुक्की, बदसलूकी और अपमानजनक व्यवहार तक किया गया — और प्रशासन तमाशबीन बना रहा।
लाइन नहीं, टोकन नहीं, सिस्टम खत्म
भीड़ नियंत्रण के नाम पर कोई इंतजाम नहीं किया गया। न कोई टोकन व्यवस्था, न लाइन की कोई सीमा और न ही कोई जवाबदेह अधिकारी मौके पर मौजूद था। सैकड़ों ग्रामीण सुबह से भूखे-प्यासे लाइन में लगे रहे, लेकिन जब खाद वितरण शुरू हुआ, तो भीड़ ने महिलाओं को जमीन पर गिरा डाला।
महिलाओं की चीखें, प्रशासन की चुप्पी
धक्का-मुक्की में कई महिलाएं व बुजुर्ग नीचे गिर गए। चीख-पुकार मचती रही, लेकिन पुलिस और समिति प्रबंधन ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। मौके पर मौजूद लोगों ने बताया कि सहकारी समिति के कर्मचारियों ने खुद को अंदर बंद कर लिया और बाहर मची अफरा-तफरी को अनदेखा किया।
दैनिक भास्कर के पत्रकार ने प्रशासन को किया अलर्ट, फिर भी नहीं जगा प्रशासन
पत्रकार द्वारा बार-बार प्रशासन को फोन करने के बाद केवल PRV पहुंची, लेकिन उन्होंने भी केवल खानापूर्ति कर लौट जाने में ही भलाई समझी। कोतवाली नगर प्रभारी अमित कुमार ने कॉल उठाना भी जरूरी नहीं समझा, जो सवाल खड़े करता है कि क्या यह केवल लापरवाही है या फिर अंदरखाने कोई साठगांठ?
*ग्रामीणों का सीधा आरोप – *मिलीभगत से चल रहा भ्रष्ट सिस्टम*
ग्रामीणों ने साफ आरोप लगाया है कि समिति प्रबंधन और स्थानीय पुलिस की मिलीभगत से ही यह अराजकता फैल रही है। ग्रामीण महिला ने बताया—
“हर बार यही होता है… हम महिलाएं सुबह से लाइन में लगते हैं, और फिर धक्के खाकर खाली हाथ लौटते हैं… कोई सुनने वाला नहीं।”
अब सवाल यह है – क्या प्रशासन किसी बड़ी मौत का इंतज़ार कर रहा है?
एक ओर सरकार किसानों को खाद की निर्बाध आपूर्ति का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर ज़मीनी हालात इसके एकदम उलट और शर्मनाक हैं। क्या खाद लेने आई महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा का कोई मूल्य नहीं?
अब देखना यह होगा कि इस रिपोर्ट के बाद प्रशासन जागता है या अगली बार किसी की मौत के बाद फाइलें खोलने का नाटक होगा?आपके अधिकार की आवाज़