गाल बजाते नेता, भ्रष्टाचार में लिप्त हो विद्युतकर्मी हुए नपुंसक , बने बड़का बाबुओं के गुलाम

हाले भ्रष्टाचार ऊर्जा विभाग

गाल बजाते नेता, भ्रष्टाचार में लिप्त हो विद्युतकर्मी हुए नपुंसक , बने बड़का बाबुओं के गुलाम
लखनऊ — यह कहानी उत्तर प्रदेश विद्युत विभाग में श्रम संगठनों की है जिनके डर के वजह से कभी भी कोई भी अधिकारी यह हिम्मत नहीं करता था की वह अपने कर्मियों का शोषण कर सके निजीकरण की बात तो दूर की कौड़ी थी मुझे याद है वह दिन जब एक संगठन के अध्यक्ष श्री राजा राम हुआ करते थे जब वह उच्च अधिकारियों से मिलने के लिए जाते थे तो उच्च अधिकारी उनके भय की वजह से अपना कार्यालय तक छोड कर निकल आते थे कि कहीं श्री राजा राम जी नाराज ना हो जाए आज उसी संगठन के कुछ पदाधिकारी केवल गाल बजाते हुए दूसरों के पीछे घूम रहे है और पूरा दिन यह बताने में नहीं चूकते की सबसे ज्यादा भीड़ उनके साथ है परंतु उन कर्मचारियों के पक्ष में काम करने या उनको निजीकरण के विरोध में बाहर ला सकने मे असमर्थ है कर्मचारी और अधिकारियों की हालत तो ऐसी है कि भ्रष्टाचार में पूरी तरह से लिप्त है और मैनेजमेंट के आगे पूरी तरह से दुम हिलाते दिखाई दे जाएंगे है जिसकी वजह से विगत कई महीनों से चली आ रही हड़ताल बेअसर हो रही है यह बड़ा खेद का विषय है कि आज की पीढ़ी के संगठनों के पदाधिकारी कुछ एक्का दुक्का संगठनों को छोड़कर शेष केवल गाल बजाने में ही अपनी पूरा समय व ताकत निकाल देते हैं और केवल इस चक्कर में शक्ति भवन के चक्कर काटते हैं की कोई कर्मचारी या परेशान अधिकारी मिल जाए जिससे उसका वह दोहन कर सके एक जमाना था केवल संगठन का पत्र चले जाने से अधिकारी तुरंत कार्य करके और कर्मचारियों का शोषण बंद कर देते थे पर आज इसका उलट है वह जमाना था जब कार्य न करने पर अध्यक्ष और मेंबर अपने घेराव और पिटाई के डर से थरथर कांपते थे और आज संगठनों के नपुंसक पदाधिकारी जो की उच्च अधिकारियों अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक को देखकर के थर-थर कांपते हैं । पहले तो एक नेताजी ने संविदा कर्मियों के ठेकेदार खैरख्वाह बन कर संविदा कर्मियों को बहला फुसलाकर अपने संगठन में लिया फिर उन्होंने की पैसे मार कर मौज मारी फिर कर्मियों के दबाव में प्रथम सूचना रिपोर्ट पुलिस ने दर्ज की अब जनाब फिर मैदान में हैं इस बार अपने दत्तक पुत्र के साथ और फूट डालो और राज करो की नीति अपनाते हुए होने जा रही हड़ताल और जेल भरो आंदोलन का विरोध कर रहे हैं ताकि मौके का फायदा उठा कर बाप बेटे जेल भरो की जगह जेब भरो आंदोलन चला सके ।
संघर्ष समिति इस निजीकरण के विरुद्ध लड़ाई को कैसे आगे जीवित रखेंगी समझ में नहीं आता है दो कदम आगे और पांच कदम पीछे । हद तो तब हो गई कुछ तथाकथित संगठन के नेता मीटर लगवाने के साथ साथ हाजरी लगाने मे भी अव्वल दिखने की होड़ में है कि किस तरह से बड़का बाबुओं की गुड़ लिस्ट में जगह बनाई जा सके वैसे इन नेताओं से अब उम्मीद तो यही है कि यह नेता जेल जाने मे भी अव्वल रह कर दिखाएंगे ताकि पहले की गलतियों के सुधार आ सके यह अंतिम अवसर है अन्यथा आगे क्या होगा आप खुद समझ हीं सकते है ऊर्जा विभाग रूपी पेड़ अगर कटेगा तो सिर्फ अपने ही विभीषणों के द्वारा वैसे मुख्य मंत्री ने अपना साफ संदेश विज्ञापन के माध्यम से प्रचारित कर दिया है अब आगे आप जानो ।
इतना तय है संघर्ष का मतलब काली पट्टी मौन जलूस नहीं है पांच बजे के बाद विरोध शक्ति भवन की परिक्रमा करना राजधानी के एक कोने में पंचायत लगाना अपने ही गाल बजाना क्या ऐसे होता है विरोध कि जंगल में मोर नाचा किसने देखा?
या जैसे कि पूर्व में नेता बुद्धि शुद्धि हवन होता था चाय पकौड़े का ठेला लगाया जाता था और फिर भी बात ना बनने अर्थी उठाई जाती थी परन्तु इस पर भी बात ना बनने पर उग्र प्रदर्शन किया जाता था यहां तक कि लातों के भूत बातों से नहीं जूते से ही मानते थे इस विधा का भी प्रयोग किया जाता था परन्तु आज के नेता तो बस चाटुकारिता में लगे हैं और अवैध रूप से नियुक्त बड़का बाबूओ की गुड़ लिस्ट में जगह बनाना चाहते हैं ताकि जेब भरो आंदोलन चलता रहे ।
इन लोगों को यह उम्मीद है कि कोई फरिश्ता आएगा आसमान से उतर कर और इन्हें बचाएगा जैसे उड़ीसा राजस्थान दिल्ली और हरियाणा में आया था और सब बच गए थे ?
अगर नहीं तो हिम्मत कर्मचारियों अधिकारियो को दिखानी होगी और इस भ्रष्टाचार मे लिप्त अवैध रूप से विराजमान बड़का बाबूओ के कर्मकांड को जनता के सामने रखना होंगा जब बड़का बाबूओ के भ्रष्टाचार की साक्ष्यों के साथ पोल खुलेगी तभी विद्युत विभाग का निजीकरण रुक पाएगा । खैर *युद्ध अभी शेष है*

अविजित आनन्द संपादक और चन्द्रशेखर सिंह प्रबंध संपादक समय का उपभोक्ता राष्ट्रीय हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र लखनऊ

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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