विद्यालय बंद करना सुधार नहीं, सामाजिक बहिष्कार है:


विद्यालय बंद करना सुधार नहीं, सामाजिक बहिष्कार है: उत्तर प्रदेश की शिक्षा नीति पर पुनर्विचार की जरूरत है।।
जब किसी समाज में प्राथमिक शिक्षा की बुनियाद को हिलाया जाता है, तो उसका असर केवल छात्रों तक सीमित नहीं रहता — वह सामाजिक समावेशन, आर्थिक न्याय और लोकतंत्र की नींव को भी झकझोर देता है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 27,000 प्राथमिक विद्यालयों को बंद करने की योजना इसी तरह का एक खतरनाक मोड़ है, जिसे प्रशासनिक दक्षता के नाम पर शिक्षा के अधिकार को कमजोर करने की नीति के रूप में देखा जाना चाहिए।

  • सरकारी तर्क बनाम जमीनी हकीकत:
    सरकार का तर्क है कि कम छात्रों वाले विद्यालयों को बंद करके संसाधनों का पुनर्विन्यास किया जाएगा, जिससे शिक्षा व्यवस्था अधिक प्रभावी और व्यावसायिक होगी। यह तर्क ‘प्रति छात्र लागत’, ‘संसाधनों का इष्टतम उपयोग’, और ‘शिक्षक-छात्र अनुपात’ के सूचकांक पर आधारित है।
    लेकिन आंकड़ों की सतह के नीचे एक गहरी सच्चाई है:
  • उत्तर प्रदेश में लगभग 64% छात्र ग्रामीण क्षेत्रों में पढ़ते हैं, और उनकी शिक्षा तक पहुंच निकटता और सामर्थ्य पर निर्भर है।
  • 2021 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति रिपोर्ट के अनुसार, विद्यालय से दूरी बढ़ने पर स्कूल ड्रॉपआउट रेट में 30% से अधिक की वृद्धि होती है।
  • लड़कियों की शिक्षा पर यह असर और भी तीव्र है — UNICEF के आंकड़ों के अनुसार, यदि स्कूल 2 किमी से अधिक दूर हो तो ग्रामीण भारत में लगभग 42% लड़कियाँ स्कूल जाना छोड़ देती हैं।
    यह निर्णय वास्तव में जिन्हें शिक्षा की सबसे अधिक आवश्यकता है, उनके लिए शिक्षा को सबसे कठिन बना देगा।
    समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण: क्या यह सिर्फ स्कूल बंद करना है?
    नहीं। यह सामाजिक बहिष्करण की प्रक्रिया का हिस्सा है, जहाँ:
  1. गरीबों, दलितों और पिछड़ों के लिए शिक्षा का दरवाजा धीरे-धीरे बंद हो रहा है।
  2. यह निर्णय नवउदारवादी राज्य की उस मानसिकता को दर्शाता है, जहाँ शिक्षा एक कल्याणकारी सेवा नहीं, बल्कि लागत-लाभ विश्लेषण का विषय बन चुकी है।
  3. यह शिक्षा को निजीकरण के लिए खाली किया जा रहा स्थान भी बनाता है — जहां कमज़ोर सरकारी ढांचे के कारण अभिभावक अनौपचारिक या निजी शिक्षा संस्थानों की ओर धकेले जाते हैं।
  • ‘विद्यालय बंदी’ का मनो-सामाजिक प्रभाव:
  • बच्चों में हीनता बोध: जब किसी का स्कूल बंद होता है, तो वह बच्चा खुद को कमतर महसूस करता है, जो दीर्घकालीन आत्म-संकोच और आत्मविश्वास की कमी में बदल सकता है।
  • अभिभावकों की अनास्था: सरकारी व्यवस्था से विश्वास उठने पर लोग या तो शिक्षा से हाथ खींच लेते हैं या प्राइवेट लोन लेकर निजी स्कूलों का बोझ उठाते हैं।
  • गाँव की सामूहिक संरचना पर आघात: ग्रामीण विद्यालय सिर्फ पढ़ाई के केन्द्र नहीं, सामाजिक संवाद, सामूहिकता और बच्चों की सामाजिकता के भी केंद्र होते हैं।
    वैकल्पिक नीति विकल्प: सरकार क्या कर सकती थी?
  1. कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को ‘पुनर्जीवित विद्यालय’ (revival schools) के रूप में विकसित किया जा सकता था — जैसे कि केरल ने किया, जहाँ सामुदायिक भागीदारी और पंचायत-आधारित मॉडल से कई बंद हो रहे स्कूल फिर से सक्रिय हुए।
  2. डिजिटल शिक्षा केंद्र के रूप में ऐसे स्कूलों को अपग्रेड किया जा सकता था — एक कक्षा में मल्टी-ग्रेड टीचिंग और डिजिटल उपकरणों का प्रयोग।
  3. विद्यालय के बंद होने की जगह ‘शिक्षक आदान-प्रदान योजना’ लागू की जा सकती थी, जहाँ शिक्षक समयानुसार निकटवर्ती स्कूलों में सेवा देते।
  4. समुदाय आधारित निगरानी तंत्र (जैसे ग्राम शिक्षा समितियाँ) को पुनर्जीवित किया जा सकता था।
  • क्या यह आरटीई (RTE) कानून का उल्लंघन नहीं है?
    भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21-A और RTE कानून 2009 के तहत 6 से 14 वर्ष के बच्चों को मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार है, और इसके अंतर्गत: “राज्य को ऐसा कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए जो शिक्षा तक पहुँच को बाधित करे।”
    विद्यालय बंदी स्पष्ट रूप से इस प्रावधान की भावना के विपरीत है।
    समाधान की दिशा: शिक्षा बंद नहीं, शिक्षा सशक्तिकरण चाहिए

सरकार को चाहिए कि वह विद्यालयों को बंद करने की प्रक्रिया को तुरंत रोके और इसके स्थान पर एक ‘शिक्षा पुनरुत्थान मिशन’ चलाए, जिसमें:

  • शिक्षकों की नियमित भर्ती
  • ग्रामीण विद्यालयों में ICT और स्मार्ट क्लास
  • स्वच्छता, पोषण और स्वास्थ्य की निगरानी
  • पुस्तकालय, खेल सामग्री और पाठ्येतर गतिविधियाँ
  • स्थानीय समुदाय को शिक्षा प्रबंधन में सहभागी बनाना
  • शिक्षा में कटौती नहीं, विस्तार चाहिए:
    उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और विविधतापूर्ण राज्य में, शिक्षा ही एकमात्र साधन है जो सामाजिक गतिशीलता को संभव बनाता है। ऐसे में प्राथमिक विद्यालयों को बंद करना कोई समाधान नहीं, बल्कि एक सामाजिक अपराध है।
    “एक राष्ट्र तभी आगे बढ़ता है जब उसका सबसे कमजोर बच्चा भी स्कूल तक बिना डर और भेदभाव के पहुँच सके।”
    यह समय है कि सरकार शासन की भाषा नहीं, संवैधानिक दायित्व की भाषा बोले। क्योंकि जब कोई स्कूल बंद होता है, तो सिर्फ एक इमारत नहीं गिरती — एक सपना टूटता है।।पंडित मुरली धर शर्मा पत्रकार

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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