
विधायिका एवं न्यायपालिका के कानून बनाने के बहस के दौरान एके बिंदुसार की टिप्पणी,
नई दिल्ली : भारतीय मीडिया फाउंडेशन के राष्ट्रीय कार्यालय नई दिल्ली से जारी बयान में भारतीय मीडिया फाउंडेशन के संस्थापक एके बिंदुसार ने संसद और न्यायपालिका के बीच जारी बहस पर अपनी राय व्यक्त करते हुए कहा कि लोकतंत्र में जनता के प्रतिनिधि विधायिका (संसद) होती है, इसलिए राष्ट्रहित में कानून बनाने का अंतिम अधिकार संसद के पास ही होना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि न्यायपालिका की भूमिका संसद द्वारा बनाए गए कानूनों की समीक्षा तक ही सीमित है और वह केवल अपने सुझाव दे सकती है।
एके बिंदुसार ने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि किसी व्यक्ति को कानून के उल्लंघन या उसके पालन में कोई समस्या है, तो वह न्यायपालिका में सही और गलत के लिए अपील कर सकता है, लेकिन न्यायपालिका को संसद द्वारा विधिवत बनाए गए कानून को समाप्त करने का अधिकार नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायपालिका को यह अधिकार है कि वह यह बताए कि बनाया गया कानून जनहित में है अथवा नहीं, लेकिन कानून बनाने का मूल अधिकार संसद का ही है।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सरकार के समक्ष विपक्ष की पार्टी संसद द्वारा बनाए गए कानून समाप्ति के लिए संसद में अविश्वास प्रस्ताव ला सकती है।
अगर वर्तमान सरकार के द्वारा बनाए गए कानून जनहित में नहीं है तो विपक्षी पार्टी सरकार बनाकर उस कानून को समाप्त कर सकती हैं।
उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में विभिन्न कानूनों और न्यायिक सक्रियता को लेकर चर्चा चल रही है। बिंदुसार ने विधायिका की सर्वोच्चता पर जोर देते हुए कहा कि चूंकि सांसद जनता द्वारा चुने जाते हैं, इसलिए उन्हें ही देश की नीतियों और कानूनों को निर्धारित करने का प्राथमिक अधिकार होना चाहिए।
भारतीय संविधान के ढांचे को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि कानून बनाने का मुख्य अधिकार संसद को ही प्राप्त है। संसद, जिसमें लोकसभा और राज्यसभा शामिल हैं, देश की सर्वोच्च विधायी संस्था है और नागरिकता, आपराधिक कानून, और कर कानूनों जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर कानून बनाने की शक्ति रखती है।
वहीं, भारत की सर्वोच्च न्यायिक संस्था, सुप्रीम कोर्ट के कार्यों पर प्रकाश डालते हुए बिंदुसार ने कहा कि न्यायालय का मुख्य कार्य कानूनों की व्याख्या करना और यह सुनिश्चित करना है कि वे संविधान के अनुरूप हों। उन्होंने न्यायिक समीक्षा की शक्ति का उल्लेख किया, जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट किसी भी ऐसे कानून को असंवैधानिक घोषित कर सकता है जो संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन करता हो।
उन्होंने माना कि कुछ सीमित परिस्थितियों में सुप्रीम कोर्ट न्यायिक निर्णयों और विशिष्ट निर्देशों के माध्यम से कानून के क्षेत्र में भूमिका निभाता है, लेकिन यह कानून बनाने की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है। बिंदुसार ने स्पष्ट किया कि कानून बनाने की प्राथमिक शक्ति संसद के पास ही निहित है, जबकि सुप्रीम कोर्ट का कार्य उन कानूनों की व्याख्या करना और उनकी संवैधानिकता की जांच करना है।
एके बिंदुसार का यह वक्तव्य लोकतंत्र में शक्तियों के पृथक्करण और संतुलन के महत्व को रेखांकित करता है, जिसमें विधायिका को कानून बनाने और न्यायपालिका को उनकी समीक्षा करने का अधिकार है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि दोनों संस्थाओं को अपने-अपने संवैधानिक दायरे में रहकर कार्य करना चाहिए ताकि लोकतंत्र की मर्यादा बनी रहे और जनता का हित सर्वोपरि रहे।