समाचार पत्रों के प्रकाशन पर सरकार की नई गाइडलाइन: मीडिया के लिए ‘काला अध्याय’ की शुरुआत?

नई दिल्ली: भारत सरकार के प्रेस पंजीकरण कार्यालय, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित होने वाले सभी समाचार पत्रों के लिए पुरानी गाइडलाइन में संशोधन करते हुए जारी की गई नई गाइडलाइन ने मीडिया जगत में खलबली मचा दी है। इस नई व्यवस्था को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया के लिए एक ‘काला अध्याय’ की शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, सरकार ने 10 मार्च 2025 को एक नई गाइडलाइन (एडवाइजरी नं. 03/2025) जारी की है। इस गाइडलाइन के अनुसार, अब जो भी समाचार पत्र केवल पीडीएफ प्रारूप में चल रहे हैं, उन सभी को अनिवार्य रूप से प्रकाशित करना होगा।
प्रेस पुस्तक पंजीकरण के नियम 10 में किए गए संशोधन के अनुसार, दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक या मासिक रूप से प्रकाशित होने वाले प्रत्येक समाचार पत्र को प्रकाशन के 48 घंटों के भीतर अपने प्रिंट संस्करण को स्कैन करके अपनी आधिकारिक आईडी के माध्यम से प्रेस सेवा पोर्टल पर अपलोड करना होगा। उदाहरण के तौर पर, यदि कोई दैनिक समाचार पत्र प्रकाशित होता है, तो उसे प्रतिदिन अपने मुद्रित संस्करण को स्कैन करके जेपीजी या पीडीएफ फॉर्मेट में अपलोड करना होगा। इसके अतिरिक्त, प्रत्येक माह की 5 तारीख से पहले प्रिंट कॉपी को पीआईबी (प्रेस सूचना ब्यूरो) के प्रादेशिक कार्यालय में जमा कराना भी अनिवार्य होगा।
प्रत्येक माह समाचार पत्र की प्रति अपलोड करने के पश्चात, प्रकाशक को अपनी आईडी से एक नियमितता प्रमाणपत्र प्राप्त होगा। इसी प्रमाणपत्र के आधार पर समाचार पत्र को नियमित माना जाएगा। यदि किसी भी कारणवश कॉपी अपलोड नहीं की जाती है, तो उस समाचार पत्र को अनियमित घोषित कर दिया जाएगा। लगातार 12 महीनों तक अनियमित रहने की स्थिति में, समाचार पत्र का शीर्षक (टाइटल) रद्द किया जा सकता है।
इतना ही नहीं, सरकार ने प्रिंटिंग प्रेस को भी इस बात के लिए पाबंद किया है कि वे अपने यहां छपने वाले समाचार पत्रों की विस्तृत जानकारी अपलोड करें, जिसमें प्रत्येक समाचार पत्र की मुद्रित प्रतियों की संख्या भी शामिल होगी।
सरकार द्वारा इस नई गाइडलाइन के जारी होने के बाद, अब समाचार पत्र संचालकों के लिए केवल पीडीएफ के रूप में अखबार चलाना आसान नहीं होगा। यदि वे निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार प्रिंट कॉपी अपलोड नहीं करते हैं, तो उनके समाचार पत्र का पंजीकरण निरस्त किया जा सकता है।
गौरतलब है कि इससे पहले विभाग के आदेशानुसार आरएनआई (भारत के समाचार पत्रों के पंजीयक) ने समाचार पत्रों की प्रतियां 48 घंटे के भीतर आरएनआई में जमा करने का आदेश दिया था। इस आदेश का जेसीआई (जर्नलिस्ट्स काउंसिल ऑफ इंडिया) ने कड़ा विरोध किया था और माननीय प्रधानमंत्री जी को पत्र लिखकर तथा सहारनपुर के माननीय सांसद फजिउर्हमान जी के पत्र के माध्यम से सरकार और माननीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री जी के समक्ष अपना विरोध दर्ज कराया था। इसी विरोध के चलते सरकार ने अपने पुराने आदेश में संशोधन किया है।
हालांकि, अभी तक इस संबंध में कोई ठोस जानकारी प्राप्त नहीं हो रही है कि भविष्य में समाचार पत्रों के प्रकाशन को लेकर सरकार की क्या रणनीति रहेगी।
इस बीच, भारतीय मीडिया फाउंडेशन ने इस नई गाइडलाइन पर अपनी कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। भारतीय मीडिया फाउंडेशन ने कहा है कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया को अभिव्यक्ति की पूर्ण आजादी मिलनी चाहिए और इस पर किसी भी प्रकार का सेंसरशिप जैसा कानून लागू नहीं होना चाहिए।
भारतीय मीडिया फाउंडेशन के संस्थापक एके बिंदुसार ने कहा कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया को संवैधानिक दर्जा मिलना चाहिए। उन्होंने यह भी मांग की कि सभी राज्यों में मीडिया पालिका और मीडिया कल्याण बोर्ड का गठन किया जाना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ स्वतंत्र होगा, तभी देश से भ्रष्टाचार मिटेगा और तभी संविधान की मूल प्रस्तावना इस देश में सही मायने में लागू हो पाएगी।
उन्होंने वर्तमान माहौल पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि हम स्वतंत्र भारत के गुलाम नागरिक हैं।
सरकार की इस नई गाइडलाइन ने निश्चित रूप से छोटे और मध्यम स्तर के समाचार पत्र प्रकाशकों के सामने कई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं, जिनके लिए नियमित रूप से प्रिंट संस्करण प्रकाशित करना और उसे निर्धारित समय सीमा के भीतर अपलोड करना आर्थिक और लॉजिस्टिकल रूप से मुश्किल हो सकता है। अब देखना यह होगा कि सरकार इस पर क्या स्पष्टीकरण देती है और मीडिया संगठन इस नई व्यवस्था का किस प्रकार सामना करते हैं।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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