पुस्तक मेला का अपना अलग स्वरुप होता है

पुस्तक मेला
पुस्तक मेला का अपना अलग स्वरुप होता है. उसका पुस्तक प्रेमियों में खासा क्रेज होता है. प्रगति मैदान के पुस्तक मेले में देश के ही नहीं विदेशों तक के पुस्तक प्रेमी उपस्थित होते हैं. इसके बाद जयपुर और लखनऊ का पुस्तक मेला भी खासी ख्याति अर्जित कर चुके हैं.
बच्चों,छात्रों और शोधार्थियों के लिए तो पुस्तक मेला उपयोगी होता ही है जहाँ उन्हें अपने नजदीक के मेले से वांछित पुस्तकें उपलब्ध हो जातीं हैं वहीं विद्वत परिचर्चा,साहित्यिक सेमिनार के माध्यम से विद्वानों को सुनने समझने का अवसर मिलता है. किताबों के प्रति रूचि जाग्रत होती है. मेले का उद्देश्य छात्रों तक ही सीमित नहीं रहता. इसमें स्थानीय,आँचलिक या राष्ट्रीय साहित्यकारों,कवियों लेखकों की सहभागिता भी सुनिश्चित की जाती है. तमाम साहित्यिक सेमिनार आयोजित किये जाते हैं जो विभिन्न साहित्यिक विषयों पर होते हैं. मेले में आये प्रकाशक और पुस्तकों के रचनाकार मिलकर अपनी नव प्रकाशित किताबों का विमोचन समारोह रखते हैं जिसमें तमाम साहित्यकार आते हैं और वे उस लेखक की किताब स्टाल से खरीदते हैं इससे लेखक और प्रकाशक दोनों को फायदा होता है.
स्थानीय व आसपास के ऐसे भी साहित्यकार होते हैं जो अपनी किताबें छपवाना चाहते हैं उन्हें पुस्तक मेले में प्रकाशक आसानी से मिल जाते हैं पुस्तक,के खर्चे पर विस्तृत चर्चा हो जाती है.इससे भी दोनों को फायदा होता है.हर प्रकाशक चाहता है कि उन्हें मेले में कम से कम एक दो पुस्तक के प्रकाशन का काम मिल जाए.अधिक से अधिक शोधार्थी,साहित्यकार,लेखक,चिंतक आएं ताकि उनकी महत्वपूर्ण पुस्तकें मेले में बिक सकें.

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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