इस कलम का महत्व ही कहां बचता है गर सबसे बड़ी ताकत ही खामोश हो जाए—

, मुर्दे हमें मुफ्त के मिल गये–
और पुतले बनाना हम खुद सीख गये–
इस कलम का महत्व ही कहां बचता है गर सबसे बड़ी ताकत ही खामोश हो जाए—

नवरात्रि और मात्र शक्ति से आज कल माहौल खुशनुमा और श्रद्धानुसार दिल मंदिर,घर शहर, गांव सब सजे हुए है तो क्यों न हमें अपनी वीरांगनाओं का संघर्ष और इतिहास याद आए और प्रेरणा के तौर पर झांसी की महारानी लक्ष्मी बाई को अपने शहर के लिए सरकार से एक तौहफे के लिए अनुरोध के साथ मांग की जाए उनकी मूर्ति स्थापना के लिए और यह आवाज में अपनी आत्मा से निकली हुई ओन्ली वन सिंगल आवाज से सरकार तक पहुंचाना चाहती हूं बिना किसी ज्ञापन भीड़ और धरना-प्रदर्शन के एक शिक्षित होने के नाते अगर इसे उचित और एक मात्र शक्ति के मुख मंडल से निकली आवाज को दे सकती है सरकार तो इस नवरात्र के इन पावन पर्वों पर मांगी हुई आत्मीय मुराद हर मात्र शक्ति की पूरी–और इस उजड़े हुए शहर को एक बड़ा तौहफा मात्र शक्ति के लिए प्रेरणा के तौर–मैं यही समझूंगी कि मां से मांगी और की गई आराधना इस पर्व पर पूर्ण हो गई वैसे मैं समझ सकती हूं कि मेरी इस मांग पर बहुत से लोगों के दिमाग में जाति भाव की भावना आ सकती है पर मेरा एसा कोई उद्देश्य नहीं है निश्पक्ष एक स्त्री-दूसरी वीरांगना स्त्री के इतिहास की प्रेरणा से अगर हौसला और साहस बटोर उसके इतिहास की मांग सकती मांग गलत नहीं है और न ही मैं इन सब चीजों में अपनी सोच और कलम को रखती हूं और न ही धरना और ज्ञापन जैसी भीड़ को–यह बात आजकल समाज का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है इस लिए किसी भी कंट्रोवर्सी से दूर रहकर अपनी अकेली आवाज एक संघर्षशील वीरांगना का इतिहास क्यों न पढूं और प्रेरणा के तौर पर सरकार से जनहित के–नाते से अपनी आवाज उठाई जाए सर्मनाक उन लोगों के लिए है जो धर्म को लेकर बदनाम तो है जैसे सरकार हमारे पिताजी की है पर सर्मनाक इस लिए कि सोच वीरांगनाओं और महिलाओं के लिए बेहद छोटी रही और है, यह हम नहीं पूर्व से लेकर आज तक का इतिहास गवाह है– और अभी तो बेटियों की चिताओं की आग पूरी तरह ठंडी नहीं हो पा रही है तब-तब तक दूसरी चिंताएं चिन दी जाती है यह देन भी धर्मों की है,जो समाज अपनी बेटियों की सुरक्षा और उनका त्याग बलिदान की सुरक्षा नहीं कर पाया और मिशाल बेमिसाल है कि हम यह है बो है पर सच तो यह है कि हम कुछ भी नहीं है पुरुष हो या महिला अपने पूर्वजों के त्याग और शक्ति एकता के कर्म और बलिदान पर कोरी डींगे हांकने के शिवाय फिर चाहे धर्म कोई क्यों न हो और जो आजकल मौत के साए जैसे माहौल से कुछ कर रहा है सबसे बड़ा दुश्मन वही हो–अंधता, धर्म,और स्वार्थ,की आंखों से दिखता तक नहीं है पर दुश्मनी इतनी बड़ी हो जाती है जैसे कितनी बड़ी प्रोपर्टी छीन ली हो–
नंगे भी हुए तो मुफ्त की जुबानों से-और शेर भी हुए तो पर दादाओं के नाम से–थोड़ी गर्दन झुका कर देखना भी जरूरी होता है हमेशा जिराफ जैसी ऊंचाई से कामयाबी हासिल नहीं मिलती है लासों पर टिकी भारत की धरती कोई बताएगा देश की सुरक्षा करने बाले बेटों के शिवाय,जब भी हमारी सुरक्षा करने जाते हैं मां के हाथ से शक्ति साहस का तिलक और आशीर्वाद लेकर हंसते हंसते जाते हैं और हमारे लिए दुश्मन से लड़ते-लड़ते ताबूत में लौटते हैं, शायद सरहद और देश पर मरने बाले के मुर्दे पर धर्म नहीं लिखा होता है और सही मायनों में बो एक मां का बेटा भी नहीं रह जाता पूरे देश का बेटा हो जाता है,पर उस मां की ममता और उस परिवार बच्चों पत्नी का क्या हाल होता होगा उस बक्त–और फिर आज के इस समाज की सोच के साथ इसका कोई लेखा जोखा हमारे पास नहीं होता है चंद दिनों की सिम्पेथी के बाद, लेकिन जो कर्म जनहित के लिए किया जाता है बो अमर हो जाता है इंसान की पहचान उसके पैसों और जाति धर्म से नहीं होती है उसके द्वारा किए गए कार्य से होती है तब हमारा यह संदेश सिर्फ इस लिए और उनके लिए है जो धर्म की सोच से समाज को शक्तिहीन बनाने पर तुले हुए हैं जुबानों से जिन्हें आज कल देवी देवता और श्रद्धा और इतिहास भी तराजू पर रख दिया है स्वार्थ की सोच तले अगर हम कुछ कर नहीं सकते हैं तो अपने पूर्वजों के त्याग और बलिदान का तो बटवारा ना करें कम-से-कम धर्मों का अगर बटवारा हो भी गया पूर्ण तरह से तो इस अंधेरे और अंधेर के भविष्य की कल्पना करना भी मात्र भयानक—
और हम उन विषय चिंतनीय बुद्धिजीवियों से भी अपेक्षा की उम्मीद रखते हैं कि अपनी कलम का प्रयोग देश,समाज,भाईचारा, मानव हित,और अविव्स्थाऔ, के लिए अवश्य करें हम इस बात को मानते और जानते भी हैं और भुक्तभोगी भी है और यह बात विश्व स्तर पर आम फैली हुई है,कि यह सब करने के लिए बहुत कुछ दांव पर लग जाता है और इसकी अभी तक सुरक्षा की तो बात छोड़ दीजिए इन व्यबस्थाऔं की इन पर इनकी नजर तक नहीं–कि सच की सुरक्षा होनी चाहिए या लावारिस बलिदान देकर दुनियां छोड़ देनी चाहिए और मुर्दे खाने में हिसाब किताब बराबर–जबकि इसकी परवरिश में करेक्टर किरदार जिंदगी अधिकार परिवार, सब दाव पर लग जाते हैं,रिश्की तो सांसें भी है इनकी भी कोई गारंटी नहीं एक अंदर गई तो दूसरी बाहर से आएगी ही,पर बात जब देश और उशूलों तक आजाए तो बोलना भी लाजमी है कि हम लिखते ही क्यों है अगर हमने अपनी कलम की दम ही घोट दी तो–
जो बात आज आम हो गई–
फिर एक पुरानी बात पर ये जश्न कैसा–

आज कितने घरों में राम है और कितने घरों में रावण है कोई हिसाब फिर एक अकेले पर ये अन्याय कैसा–
अब कोरे पन्नों पर नये शब्द नहीं उगते बंजर भूमि के समान रद्दी में बिक जाते हैं या दम घोट दी जाती है खुली आंखों से जैसे मां की कोख में बेटियों के भ्रूण का दम घोट दिया जाता है, और जिंदा जमीन पर आ भी गई तो उस दुर्दशा से कौन अनभिज्ञ हैं न प्रेरणा की फसल आगे उगी न वीरांगनाओं के त्याग और बलिदान की कद्र हुई क्योंकि राम ने रावण मार दिया उससे श्रेष्ठ ताकतों का कोई दूसरा जश्न ही नहीं मुफ्त के मुर्दे मिल गये और पुतला बनाना हमने सीख ही लिया कमी अब आग की कहां यदा कदा को छोड़कर हर हाथ में माचिस है फिर–तब हम कहां जा रहे हैं कोई फर्क नहीं पड़ता,न मंजिल का पता न खुद का बस चले जा रहे हैं, हम और हमारी सोच क्या से क्या हो गई अधिकार मांगते हैं तो जिंदा आदमी का पुतला फूंक कर और इतिहास का जश्न मनाते हैं तो मुर्दे- हमें इसआज के नये इतिहास की परिभाषा ही समझ में नहीं आती है मानव की असली सोच और कर्म क्या है और कर क्या रहा है दादा परदादा मर गये इस देश को बचाने में–
और नाती पोते तराजू लेकर बैठे हैं इसे भुनाने में–
विषय आज बहुत जटिल है अब वही लड़ाई पुनः लड़ने में, क्यों कि पहले कम-से-कम दुश्मन बाहर का तो था आज तो पता ही नहीं चलता घरों में है या आस्तीनों में और फिर लड़ना भी तो धर्मों से है।
लेखिका-पत्रकार-दीप्ति चौहान।✍️

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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