
आज, 28 सितंबर, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रेरणादायक और साहसी क्रांतिकारी, शहीद-ए-आज़म भगत सिंह का जन्मदिवस है। उनके जीवन, विचारधारा, और साहस ने न केवल ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष को नया मोड़ दिया, बल्कि भारत के भविष्य के लिए एक आदर्श समाज की नींव रखी। भगत सिंह का नाम क्रांति का पर्याय बन चुका है, और उनकी सोच, जिसने साम्प्रदायिकता, जातिवाद, साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के खिलाफ आवाज बुलंद की, आज भी हमारे लिए उतनी ही प्रासंगिक और प्रेरणादायक है।
भगत सिंह का क्रांतिकारी सफर तब शुरू हुआ जब उन्होंने “हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन” (HSRA) से जुड़कर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का रास्ता चुना। उनका उद्देश्य केवल अंग्रेजों से आजादी पाना नहीं था, बल्कि एक समतावादी और समाजवादी व्यवस्था की स्थापना करना था, जहां सभी को समान अधिकार मिलें और समाज में कोई भी आर्थिक या सामाजिक शोषण न हो। HSRA का नारा था “इंकलाब जिंदाबाद,” यह नारा उस समय युवाओं की जुबां पर चढ़ गया था और आज भी स्वतंत्रता, संघर्ष और न्याय के प्रतीक के रूप में जीवित है।
भगत सिंह की छवि को केवल बम-पिस्तौल तक सीमित करने का काम शोषक वर्ग द्वारा किया जाता रहा है, जबकि उन्होंने कहा था:
“क्रांति से हमारा मतलब यह नहीं है कि बम और पिस्तौल चलाकर खून की नदियां बहाई जाएं। क्रांति से हमारा अभिप्राय अन्याय पर आधारित व्यवस्था को उखाड़कर उसकी जगह एक नई व्यवस्था स्थापित करना है।”
(संदर्भ: “युवराज” से साक्षात्कार, 1931)
यह स्पष्ट करता है कि भगत सिंह के लिए क्रांति केवल हिंसक संघर्ष का नाम नहीं था; यह सामाजिक ग़ैर बराबरी, और आर्थिक शोषण के खिलाफ संघर्ष का नाम था। उन्होंने जीवनभर जाति और धर्म के आधार पर समाज के विभाजन का दृढ़ विरोध किया। साम्प्रदायिकता और जातिवाद को उन्होंने समाज की एकता के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया।
आज जब हम समाज में धर्म और जाति के नाम पर बढ़ते विवाद और विभाजन को देखते हैं, भगत सिंह की ये बातें हमें गहरे सोचने पर मजबूर करती हैं। भगत सिंह ने लिखा था:
“मैं नास्तिक इसलिए हूं क्योंकि मैं खुद को विश्वास में नहीं बांध सकता। मेरा धर्म न्याय, समानता और तर्क है।”
(संदर्भ: “मैं नास्तिक क्यों हूं”, 1930)
उनका यह दृष्टिकोण बताता है कि उन्होंने कभी धर्म को राजनीति में जगह नहीं दी और समाज में तर्कशीलता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को महत्व दिया। वर्तमान समय में जब धार्मिक उन्माद और अंधविश्वास बढ़ रहे हैं, भगत सिंह की सोच हमें धर्मनिरपेक्षता और तर्क के महत्व की याद दिलाती है।
भगत सिंह पूंजीवाद और साम्राज्यवाद के धुर विरोधी थे। उन्होंने आर्थिक शोषण और असमानता को समाज की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक माना। उन्होंने लिखा:
“जो भी समाज में शोषण और अन्याय का विरोध करता है, वह मेरा साथी है।”
(संदर्भ: “साम्राज्यवाद का विनाश”, 1928)
इससे यह स्पष्ट होता है कि भगत सिंह केवल ब्रिटिश शासन के खिलाफ नहीं थे, बल्कि हर प्रकार के आर्थिक और सामाजिक ग़ैर बराबरी के खिलाफ लड़ रहे थे। आज जब हम देखते हैं कि अमीरी और गरीबी के बीच की खाई लगातार बढ़ रही है, मजदूर और किसान अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं, तब भगत सिंह की समतामूलक समाज बनाने की विचारधारा एक मजबूत मार्गदर्शन बनकर उभरती है।
23 मार्च 1931 को जब भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गई, तब भगत सिंह केवल 23 साल के थे, लेकिन इतने कम उम्र में उन्होंने जो विचारधारा और आंदोलन छोड़ा, वह आज भी जीवित है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि आजादी का मतलब केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं है; इसका अर्थ है समाज के हर व्यक्ति को समान अधिकार, न्याय और स्वतंत्रता मिलना।
आज के समय में, जब धार्मिक कट्टरता, आर्थिक ग़ैर बराबरी, शोषण-उत्पीड़न समाज को तबाही की ओर ले जा रहे हैं, मेहनतकशों का जीना मुश्किल होता जा रहा है, ऐसे में भगत सिंह की सोच और भी प्रासंगिक हो जाती है, यह हमें हर तरह के जुल्मों सितम से मुक्ति का रास्ता दिखाती है। हमें धर्म और जाति के आधार पर विभाजन से मुक्त होकर एक ऐसे समाज का निर्माण करना होगा, जहां हर व्यक्ति को समान अवसर मिले और आर्थिक असमानता का अंत हो। भगत सिंह के विचारों की लौ हमें याद दिलाती है कि एक सच्चे स्वतंत्र और न्यायपूर्ण समाज की स्थापना करने का उनके द्वारा शुरू किया गया काम मंज़िल तक पहुँचाये बिना समाज और आगे नहीं बढ़ सकता है।
भगत सिंह की जयंती हमें प्रेरित करती है कि हम उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारें और एक ऐसे समाज का निर्माण करें जिसका सपना उन्होंने देखा था—एक ऐसा समाज जो शोषण मुक्त, समतावादी, न्यायप्रिय और स्वतंत्र हो। उनके विचार और बलिदान हमें इस बात का आह्वान करते हैं कि असली आजादी समाज के हर तबके को न्याय दिलाने और समानता स्थापित करने में है।
क्रांतिवीर सुखवीर सिंह