
अवध के अंतिम नवाब, मिर्जा वाजिद अली शाह ने एक छोटे से कार्यकाल में शासन किया, जो चुनौतियों और विवादों से भरा हुआ था। 1847 में वो गद्दी पर बैठे, उन्हें एक ऐसा राज्य विरासत में मिला जो पहले से ही कमज़ोर था, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ हुए समझौतों की वजह से। कुप्रबंधन के इल्ज़ामों का सामना करने के बावजूद, हालिया अध्ययनों से पता चलता है कि स्थिति उतनी खराब नहीं थी, जितना अंग्रेजों ने पेश किया था। आखिरकार अंग्रेज़ों ने 1856 में अवध को अपने साम्राज्य में मिला लिया।
वाजिद अली शाह कला के दीवाने थे, जो शायरी, संगीत और नाच के बेहद शौकीन थे। उन्होंने मुगलों के पतन के बाद कथक को दरबारी नाच के रूप में पेश किया। अपने राज्य को खोने के बाद वो कलकत्ता निर्वासित हो गए, मगर उन्होंने अपनी कलात्मक रुचि को जारी रखा। यहाँ तक कि उन्होंने निर्वासन में “मिनी लखनऊ” बसाया, जिसमें बगीचे, संगीतकार और कलाकार शामिल थे। उन्हें सत्ता में वापसी की उम्मीद थी, लेकिन आखिरकार 1887 में निर्वासन में ही उनका इंतकाल हो गया। उनकी विरासत पेचीदा है, उनके शासन और योगदान को लेकर अलग-अलग विचार मौजूद हैं।