
आलोचना क्यों जरूरी ?
परमार सम्राट भोज सम्राट, जो कि सन् 1010 से 1055 तक उत्तर भारत के बड़े हिस्से पर शासन कर रहे थे, उनकी शिक्षा, साहित्य और संस्कृति के प्रति दीवानगी इस बात से समझी जा सकती है कि उन्होंने अपनी राजधानी धारा (आधुनिक धार) में रहने की पात्रता ही विद्वत्ता को बना दिया। यदि आप पढ़े – लिखे विद्वान है तो फिर भले ही आप किसी भी जाति के हों, किसी बिरादरी के हों। राजधानी में ससम्मान रह सकते थे, किंतु यदि आप उच्च कुल के ब्राह्मण भी है, मगर मूर्ख है तो भोज की राजधानी में आपके लिए कोई जगह नहीं थी।
शायद वे दुनियाँ के पहले और आख़िरी सम्राट थे, जिन्होंने विद्वत्ता को इस स्तर पर सम्मानित करने का बीड़ा उठाया। मेरिटोक्रेसी का इससे बड़ा उदाहरण आपको कहीं नही मिलेगा। देखते ही देखते उनकी राजधानी विद्वानों, कलाकारों के वैश्विक केंद्र के रूप में उभर गई। शहर के घर दार्शनिक, चिंतन और चौक चौराहे शास्त्रार्थ के आश्रयस्थल बन गये। राज्य द्वारा शिक्षण पर लगाई शक्ति के चलते यहाँ छोटे से छोटा इंसान भी सुंदर काव्य सृजन में निष्णात हो गया था।
कहते है जब कश्मीर के प्रसिद्ध कवि कोबिन्द रहने को जब धारा आये तो सरकारी मुलाजिमों के सम्मुख संकट खड़ा हो गया कि उन्हें आवास कहाँ दिया जाए?
आनन फ़ानन में यह सोच कर कि शायद शहर में रहने वाला एक जुलाहा धारा की शैक्षिक योग्यता के मापदंड पर खरा न होगा, घर ख़ाली करने को कहा गया। जुलाहा तुरंत सम्राट से मिला और मिल कर उसने अनुप्रास अलंकार से अलंकृत शुद्ध संस्कृत में ऐसा छंदबद्ध प्रश्न किया ……..
“काव्यं करोमि नहि चारुतरं करोमि,
यत्नात् करोमि यदि चारुतरं करोमि।
भूपालमौलि मणिमंडित पादपीठ, हे भोजराज कवयामि वयामि यामि”।।
(मैं काव्य भी करता हूँ, बहुत सुंदर तो नहीं करता, किंतु यत्न करने पर सुंदर भी कर लेता हूँ। हे भोजराज! अब आप ही बताए, मैं कपड़ा बुनूँ, काव्य करूँ या फिर यहाँ से चला जाऊँ?)
यह सुनकर सम्राट के पाँव के नीचे से ज़मीन निकल गई। यही नहीं जब पूरी धारा में एक भी अनपढ़ और मूर्ख न मिला कि जिसका घर ख़ाली करवाया जा सके तो मजबूरन राजा को कवि कोबिंद को सम्मान देने के लिए ख़ुद के महल में रखना पड़ा।
जिसके राज्य में ऐसा वैशिष्ट्य हो, शिक्षा का ऐसा स्तर हो, तो लाज़मी था कि उसके लिए संस्कृत में कहावत बन गई, कथः राजा भोज, कथः गंग, कथः तैलंग जो उसकी तुलना भारत के दो अन्य समकालीन सम्राटों से करती थी। कहाँ राजा भोज, कहाँ कलचुरी सम्राट गांगेय और कहाँ सम्राट तैलंग?
किंतु संस्कृत की ये कहावत हिंदी में आते आते अपना अर्थ ही खो बैठी और कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली में बदल गई। बहरहाल हमारे ये नायक सम्राट जितने साहित्य प्रेमी थे, उतने ही सुहृदय भी थे।
एक बार जब सम्राट भोज भ्रमण पर निकले तो उन्हें मार्ग में एक लकड़हारा मिल गया जो लकड़ियों का भारी बोझ ले कर जा रहा था, उसे देखते ही कोमल ह्रदय सम्राट के मुँह से निकल पड़ा किम ते भारम् बाधति (क्या ये भार आपको कष्ट पहुँचा रहा है?) किंतु स्वयं सम्राट भोज ये प्रश्न पूछते वक़्त भावावेश में बाधते शब्द की जगह बाधति शब्द का त्रुटिपूर्ण प्रयोग कर गए। ज़ाहिर सी बात है विद्वानों की नगरी में ये त्रुटि क्षम्य नही था। विशेषकर जब ये त्रुटि ख़ुद सम्राट द्वारा की गई हो, तब तो बिलकुल भी नहीं! चुनाचें विद्वान लकड़हारे ने तुरत पलटकर जवाब दिया……..
भारो न बाधते राजन, यथा बाधते बाधति
अर्थात हे राजन, सिर पर लकड़ी के भार से मुझे इतना कष्ट नहीं हो रहा, जितना कि आपके मुख से बाधते शब्द के स्थान पर बाधति शब्द सुन कर हुआ है। बात सही भी थी। सरस्वती कंठाभरण के महान लेखक और भोजशाला जैसे महान शैक्षणिक केंद्र के निर्माता से ऐसी त्रुटि किसी भी काव्यप्रेमी को कष्ट पहुँचा सकती थी। यहाँ तक कि एक निर्धन लकड़हारे को भी इससे तकलीफ़ हो सकती थी और अब लकड़हारे का यह कष्ट हज़ार साल से ज्यादा की यात्रा कर हम तक पहुँच गया!
कहानी का एक तथ्य जिस पर हम सभी को विशेषकर हमारे सत्ताधीशों को गौर करना चाहिए कि उस दौर में जब सार्वभौम शक्तिशाली सम्राटों में साम्राज्य की सारी शक्तियाँ निहित होती थी, तब भी दोनों अवसरों पर राजा भोज ने अपनी आलोचना को कितना सकारात्मक ढंग से लिया! न वो उस जुलाहे से नाराज़ हुए, जिसने उनके प्रशासनिक निर्णय को चुनौती देते हुए बड़ी तल्ख़ी से प्रश्न किया था कि मैं कपड़ा बनूँ, काव्य रचना करूँ या फिर धारा नगरी को छोड़ कर चला जाऊँ? न वो उस लकड़हारे से इतना नाराज़ हुए जिसने इस विद्वान सम्राट के शब्दों के चयन की इस कदर मज़ाक़ उड़ा दी थी कि बोझ तकलीफ़ नहीं दे रहा, तकलीफ़ तो आप द्वारा प्रयुक्त अशुद्ध शब्द दे रहा है!
शायद सम्राट जानते थे कि राज्य में शिक्षा का उच्च स्तर राज्य की आलोचना के जोखिम के साथ ही आता है। उच्च स्तरीय शिक्षा राज्य को और स्वयं उन्हें भी आलोचना का पात्र बना सकती है। किंतु उत्तंग व्यक्तित्व, आलोचना से भयभीत नहीं होते। स्वाभाविक था कि भोज भी नहीं हुए।
किंतु आलोचना की इसी चुनौती से बचने के लिए कालांतर में पदारूढ़ सत्ताधीशों ने शिक्षा पर नियंत्रण के प्रयास किया जो सिलसिला आज तक बदस्तूर जारी है। ऐसे में बस एक ही विकल्प तो शेष रह जाता कि हम सब मिल कर भगवान से प्रार्थना करें कि काश, हमारे युग में भी कोई भोज मिल जाए!!