
मारवाड़ के वीर योद्धा अमरसिंह जी राठौड़ ने सिद्ध कर दिया था कि इतिहास में नाम दर्ज कराने के लिए एक दिन एक क्षण ही पर्याप्त है, यदि वह कार्य स्वाभिमान से सिर उठा कर किया जाए…. जिस क्षण मुगल बादशाह शाहजहां के भरे दरबार में वज़ीर सलावत खां का सिर कटकर गिरा, वही वो क्षण था।
बात उस समय की है जब एक दिन शाहजहाँ अपने दरबार मे बैठे थे और अपनी महिमा का गुणगान स्वयं कर रहे थे। बादशाह जहाँ बैठे थे उस सिंहासन के बारे में कहा गया है कि इंसानों से ज्यादा क़ीमत बादशाह के सिंहासन तख्त-ए-ताऊस की थी । तख्त-ए-ताऊस में 30 करोड़ रुपए के हीरे और जवाहरात लगे हुए थे । इस तख्त की भी अपनी कथा-व्यथा थी । तख्त-ए-ताऊस का असली नाम मयूर सिंहासन था । 300 साल पहले यही मयूर सिंहासन देवगिरी के यादव राजाओं के दरबार की शोभा था । यादव राजाओं का सदियों तक गोलकुंडा के हीरों की खदानों पर अधिकार रहा था । यहां से निकलने वाले बेशक़ीमती हीरे, मणि, माणिक, मोती..मयूर सिंहासन के सौंदर्य को दीप्त करते थे । लेकिन समय चक्र पलटा.. दिल्ली के क्रूर सुल्तान अलाउदद्दीन खिलजी ने यादव राज रामचंद्र पर हमला करके उनकी अरबों की संपत्ति के साथ ये मयूर सिंहासन भी लूट लिया। इसी मयूर सिंहासन को फारसी भाषा में तख्त-ए-ताऊस कहा जाने लगा।
दरबार का अपना सम्मोहन होता है और इस सम्मोहन को राजपूत वीर अमर सिंह राठौर ने अपनी पद चापों से भंग कर दिया । अमर सिंह राठौर.. शाहजहां के तख्त की तरफ आगे बढ़ रहे थे । तभी मुगलों के सेनापति सलावत खां ने उन्हें रोक दिया ।
सलावत खां- ठहर जाओ… अमर सिंह जी… आप 8 दिन की छुट्टी पर गए थे और आज 16वें दिन तशरीफ़ लाए हैं ।
अमर सिंह- मैं राजा हूँ । मेरे पास रियासत है फौज है.. किसी का गुलाम नहीं ।
सलावत खां- आप राजा थे… अब हम आपके सेनापति हैं… आप मेरे मातहत हैं । आप पर जुर्माना लगाया जाता है… शाम तक जुर्माने के सात लाख रुपए भिजवा दीजिएगा ।
अमर सिंह- अगर मैं जुर्माना ना दूँ !
सलावत खां- (तख्त की तरफ देखते हुए) हुज़ूर… ये काफिर आपके सामने हुकूम उदूली कर रहा है।
अमर सिंह के कानों ने काफिर शब्द सुना । उनका हाथ तलवार की मूंठ पर गया… तलवार बिजली की तरह निकली और सलावत खां की गर्दन पर गिरी । मुगलों के सेनापति सलावत खां का सिर जमीन पर आ गिरा… अकड़ कर बैठा सलावत खां का धड़ धम्म से नीचे गिर गया । दरबार में हड़कंप मच गया… वज़ीर फ़ौरन हरकत में आया वो बादशाह का हाथ पकड़कर भागा और उन्हें सीधे तख्त-ए-ताऊस के पीछे मौजूद कोठरीनुमा कमरे में ले गया । उसी कमरे में दुबक कर वहां मौजूद खिड़की की दरार से वज़ीर और बादशाह दरबार का मंज़र देखने लगे ।
दरबार की हिफ़ाज़त में तैनात ढाई सौ सिपाहियों का पूरा दस्ता अमर सिंह पर टूट पड़ा था । देखते ही देखते… अमर सिंह ने शेर की तरह सारे भेड़ियों का सफ़ाया कर दिया ।