
भूकंप, ज्वालामुखी, क्लाउड बर्स्ट कहें या बादल फटना या सुनामी आदि ये ऐसी आपदाएं हैं जिनका पूर्वानुमान असंभव है। विज्ञान और तकनीक की चहुंमुखी प्रगति के बावजूद इन आपदाओं के बारे में पूर्व चेतावनी तंत्र विकसित करने में हम आज भी नाकाम हैं। यही नहीं हम इनका सही समय का निर्धारण भी कर पाने में नाकाम हैं जिससे इन आपदाओं से समय रहते बचाव के प्रयास भी कर सकें। बीते दिनों उत्तर भारत ने चार भूकंपों का सामना किया। इससे अब यह लगने लगा है कि यह कहीं इस क्षेत्र में आने वाले दिनों में किसी बडे़ भूकंप का संकेत तो नहीं हैं। हालात तो इस आशंका को बल प्रदान करते दिखाई देते हैं।
इस बारे में पर्यावरणविद ज्ञानेन्द्र रावत का कहना है कि हमारे देश में भूकंप का खतरा बहुत ही ज्यादा है। उस स्थिति में जबकि 2022 में देश में 1000 से ज्यादा बार भूकंप के झटके आये हैं। विडम्बना है कि यह सब जानते समझते हुए भी देश के राज्यों में भूकंप से निपटने हेतु कारगर नीतियों का अभाव है। यह हाल तब है जबकि देश के भूगर्भ विज्ञानी, वैज्ञानिक,पर्यावरणविद और इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन जियोलाजी के विज्ञानी काफी लम्बे अरसे से यह चेता रहे हैं कि उत्तर भारत के हिमालयी क्षेत्र में बडा़ भूकंप कभी भी आ सकता है। इसलिए समय की मांग है कि भूकंप से सुरक्षा के कारगर उपाय किये जायें, उनका प्रचार-प्रसार किया जाये और भवन निर्माण प्रक्रिया में भूकंपरोधी तकनीक के प्रयोग को आवश्यक बनाया जाये और उसे कानूनी रूप दिया जाये। तभी इस आपदा से बचाव में कामयाबी मिल सकती है।