प्लास्टिक के सूक्ष्म कणों की चपेट में हैं सभी जीव

संकट पानी, जमीन और हवा
में मौजूद होने से रक्त में घुल
रहा
प्लास्टिक के सूक्ष्म कणों की चपेट में हैं सभी जीव

आधुनिक विश्व में प्लास्टिक के सूक्ष्म कण जल, जमीन और हवा में इस कदर व्याप्त हो गए हैं कि इनसे किसी भी प्राणी का अछूता रहना लगभग असंभव हो गया है। विज्ञान पत्रिका यूरोप एक्वाकल्चर में छपे ताजा शोध पत्र के अनुसार हम जिस टी-बैग को गर्म पानी में डालकर चाय बनाते हैं, उसके माध्यम से भी ऐसे कण शरीर के भीतर रक्त में घुल रहे हैं।

शोध पत्र के लेखक और पद्मश्री से सम्मानित भारतीय वैज्ञानिक डॉ. अजय कुमार सोनकर ने कहा, हमारी कल्पना के परे अनेक माध्यमों से माइक्रॉन व नैनो आकार के प्लास्टिक के कण हमारे खून में निरंतर पहुंच रहे हैं। उन्होंने बताया कि प्लास्टिक एक अप्राकृतिक पदार्थ है, जिसका एक सामान्य गुण होता है कि समय बीतने के साथ वह अपना लचीलापन खो देता है और भंगुर होकर टूटता है। इन कणों की भंगुर होने की प्रक्रिया धूप और संक्षारक (कोरोसिव) वातावरण में तेज हो जाती है, तो इसके कण माइक्रॉन और नैनो पार्टिकल में बदलकर पूरे वातावरण में फैल जाते हैं और बरसात के पानी के साथ हर जल स्रोत (नदी पोखर, सिंचाई के पानी) में पहुंचते हैं। वहां से ये कण वाष्पीकरण के बाद बादलों तक पहुंच जाते हैं और फिर बादलों के माध्यम से उन स्थानों तक भी पहुंच गए हैं, जिन्हें अछूता क्षेत्र (पहाड़-ग्लेशियर) समझा जाता रहा है। यानी यह हमारी भोजन श्रृंखला में शामिल हो गया है। ये प्लास्टिक शरीर में जाकर तमाम जैविक क्रियाओं को बाधित कर मनुष्य के लिवर, गुर्दे सहित तमाम अंगों को नष्ट कर रहा है।

समुद्री सीप में भी मिला

अंडमान के समुद्री सीप के टिशू का माइक्रोस्कोप में विश्लेषण करने पर इसमें कुछ अज्ञात कणों की उपस्थिति दिखी। अध्ययन करने पर पता चला कि वो प्लास्टिक के कण थे। सवाल उठा कि ये समुद्री सीप के टिशू में कहां से आया? इसका जवाब था कि यह खून से आया होगा, खून में भोजन से आया होगा।

रोगजनक रसायन कई बीमारियों का खतरा

शोध पत्र के लेखक ने कहा, समस्या इतनी विकट है कि यह सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध से खत्म नहीं हो सकती। एक वैज्ञानिक अध्ययन का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि एक सामान्य व्यक्ति करीब पांच ग्राम प्लास्टिक के कण हर सप्ताह अपने शरीर में पहुंचा रहा है। प्लास्टिक में बिस्फेनाल-ए, बी़पीए, थैलेट्स, परपालीफ्लोरोअल्काइल सब्सटांस (पीएफएएस) जैसे तमाम जहरीले रसायन होते हैं, जो कैंसर जैसे गंभीर रोगजनक रसायन हैं। इससे कैंसर के अलावा कई बीमारियां हो सकती हैं।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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