
संसद में बहस हो, और सदन हंगामेबाजी का अखाड़ा न बने। विशेष सत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों ने परिपक्वता दिखाई
सदन चलने का मतलब होता है शोर- शराबा, पर विशेष सत्र कितना शानदार रहा। सत्र के आरंभ होने से पूर्व विपक्ष की पूरी तैयारी थी कि मणिपुर के मुद्दे को फिर से जिंदा करके सदन को लगातार बाधित करना है। मगर जैसे ही सदन शुरू हुआ, लगा कि विपक्ष को सम्मोहित कर लिया गया है। एक तरफ, जहां राज्यसभा के सभापति नेता प्रतिपक्ष खड़गे को पांच-पांच मिनट का वक्त मित्रवत दे रहे थे, तो उधर लोकसभा में प्रधानमंत्री मोदी नेहरू जी की प्रशंसा कर रहे थे।
संजय सिंह और राघव चड्ढा का निलंबन खत्म करने के लिए खड़गे साहब ने आवाज उठाई थी। इस मुद्दे को लेकर दूसरे दिन का सत्र खराब किया जा सकता था, लेकिन घोषणा कर दी गई कि 930 बजे ही फोटो सेशन किया जाएगा। समय से पहले तमाम सांसद फोटो सेशन के लिए निर्धारित जगह पर पहुंच गए। यह फोटो सेशन भी दूसरे दिन के सत्र की शुरुआत में शांति का सौदा बन गया। फिर, जिस नए संसद भवन पर तमाम हंगामे खड़े किए गए थे, भूख और बेरोजगारी की दुहाई दी गई थी, बिना किसी विरोध के सब मोदी जी के पीछे-पीछे चल दिए। इतिहास में यह शायद पहली तस्वीर थी, जब कोई प्रधानमंत्री सभी 543 सदस्यों को पीछे लेकर, उनका नेतृत्व करते हुए सीना ताने जा रहे हो। कोई विरोध-प्रतिरोध के बिना सभी सांसद पीछे-पीछे। आश्चर्यजनक!
लोकसभा में जो महिला आरक्षण बिल आया, वह इस सरकार का तीसरा सम्मोहिनी अस्त्र था। महिला आरक्षण से जुड़े बिल को सबका साथ मिला। देखा जाए, तो विपक्ष सत्ता पक्ष पर मोहित रहा। यानी, कहीं न कहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेतृत्व, जिस काबिलियत के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है, वह भारत जैसी हंगामेदार संसदीय परंपरा में आश्चर्यजनक तस्वीर पेश कर रहा था। इस सुंदर और सुखद तस्वीर के हम सभी साक्षी बने। यह एक बड़ा नागरिक सौभाग्य है।