
कभी ध्यान दिया है आपने , दुनियाँ भर में भूकम्प या तो पूर्णिमा , अमावस्या या किसी ग्रहण पर ही आते हैं
फिर लोग कहते हैं कि चन्द्रमा का हमारे मन मस्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ता है !!
चन्द्रमा मन को प्रभावित करता है और उन सभी अवयवों को प्रभावित करता है जो द्रव ( Liquid ) के रूप में हो ।
चन्द्रमा ही कारक है प्राकृतिक आपदाओं का ।
इसी हेतु प्रलयंकारी और प्रलय के अधिष्ठात्र भगवान शंकर चन्द्रमा को अपने शीश पर धारण करते हैं ।
चूँकि चन्द्रमा को शाप एक बार गणेश जी ने भी दिया था , और चन्द्रमा उनसे डरते हैं , उसी हेतु ज्वालामुखी के मुख पर श्री गणेश को बिठाकर उनकी आराधना की जाती है कि यह चन्द्रमा द्वारा ज्वालामुखी के क्रियाशील होने को बाधित करेंगे , आज भी इंडोनेशिया में गणेश जी की मूर्ति ज्वालामुखी के मुहाने पर पूजनीय है ।
इसीलिए हमारे यहाँ पूर्णिमा और अमावस्या पर विशेष प्रकार के नियम और सिद्धांत बनाये गए ।
दशमी आते ही व्रत उपवास के नियम शुरू हो जाते हैं । एकादशी , द्वादशी , त्रयोदशी , चतुर्दशी तक विभिन्न प्रकार के नियम कानून बनाये गए जिससे मनुष्य स्वस्थ्य रह सके ।
एकादशी पर चावल नहीं खाना । चावल जल में ही पैदा होता है और जल में ही पकता है , चावल चन्द्रमा की किरणों को किस प्रकार अवशोषित कर उससे प्रभावित रहता है और चन्द्रमा के किस दिन किस कोण से प्रभावित होगा , हमारे ऋषि मुनि को यह पहले ही ज्ञात था ।
इसी हेतु उन्होंने डरवा कर भय से अर्थात तरह तरह के उसमें कथा कहानी जोड़ कर उससे विमुख करवाया ।
क्योंकि यह मन को प्रभावित करेगा और फिर चंचल मन भगवान के ध्यान में नहीं लगेगा और मूल उद्देश्य की प्राप्ति से वंचित रह जायेगा ।
चन्द्रमा की किरणें समुद्र में ज्वार भाटा का कारण बनती हैं ।
पृथ्वी के अंदर उपस्थित द्रव रूप में जो कुछ भी है चाहे लोहा , तांबा या कोई भी metal के साथ साथ पत्थरों के magma तक का संचालन चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण के द्वारा होता है ।
अगर चन्द्रमा न हो तो पृथ्वी का संतुलन बिगड़ जाएगा ।
पृथ्वी की समस्त औषधियाँ और वनस्पतियाँ इसी से पुष्ट होती हैं ।
कोई भी साधना या विशेष अनुष्ठान करने के लिए भी अमावस्या , पूर्णिमा या ग्रहण काल उचित बताया गया है ।
यह चन्द्रमा इतना प्रभावित करता है कि यह व्यक्ति को महान बुद्धिमान भी बना सकता है और यह जीव को पागलपन की स्थिति में भी ला सकता है ।
इसीलिए पागल व्यक्तियों को “Lunatic” बोला जाता है ।
Lunar का अर्थ चन्द्रमा से है । पागलखाने को भी “Lunatic Asylum” बोला जाता है । हमारे यहाँ से बहुत सी पुस्तकें बाहर ले जाई गयी और उन्हीं पुस्तकों से ज्ञान प्राप्त कर Western ने यह नाम दिया ।
ऋषि दुर्वासा के प्रभाव से जब राजा दुष्यंत शकुंतला को भूल जाते हैं तो ऋषि कण्व उसे चन्द्रमा की आराधना करने को कहते हैं ।
Cushing Syndrome नामक बीमारी जिसमें व्यक्ति का चेहरा Moon like हो जाता है जिससे मन्द बुद्धि और दिमाग का हल्कापन भी होता है , उसका भी कारण चन्द्रमा है ।
इसीलिए इन सबसे बचाने के लिए हमारे शास्त्रों में अमावस्या , पूर्णिमा के दिन स्त्री से सहवास ( Sex ) को वर्जित बताया गया है ।
इस दिन गर्भाधान करने वाले बच्चे या तो अपंग या मंदबुद्धि पैदा होते हैं ।
और पूर्णिमा के दिन पैदा होने वाले बच्चों में विशेष प्रकार का गुण पाया जाता है ।
अधिकतर सन्त या महापुरुष का जन्म पूर्णिमा के ही दिन होता है ।
लेकिन सभी नहीं ।
चन्द्रमा अगर ख़राब होते हैं तो उन जातकों का मन चंचल होता है ।
इसी हेतु उन्हें मोती ( जो जल से प्राप्य है और श्वेत वर्ण होने के कारण चन्द्रमा का द्योतक है ) उसे पहनाया जाता है ।
इसीलिए चन्द्रमा को ऐरा गैरा न मानें । इसका प्रभाव इस पृथ्वी के समस्त जीव चाहे वह चर हो या अचर हो ,सब पर होता है ।
इसलिए अपने शास्त्रों की बात मानते हुए उनका अनुपालन करें और सदा एक बात ध्यान रखें –
“भज गोविंदं भज गोविंदं गोविंदं भज” !