कुछ सीख कर गए और कुछ सिखाकर गए

यही दिन थे मगर वर्ष ८५था। एक सुबह तीन विदेशी साइकिल पर थे । उनसे हल्की अंग्रेजी भाषा में बात हुई जिसमें पता कुछ कर पाते कि तभी मेरे पिता जी आ गए । उनसे उनकी बात हुई तो भाषा ही बदल गई । थोड़ी देर बाद वो तीनों हमारी बैठक में थे । खाट पर वे तीनों और कुर्सी पर पिताजी बैठे थे । चाय के साथ और नाश्ता की पिताजी ने कही । हमारी बहू ने नाश्ता बनवाया । है अपनी मां को बहू संबोधन देते थे । एक घंटा दो घंटा बीते तीसरे घंटे पर कढ़ी चावल का लंच हुआ । रोटी अनलोगों ने कम मगर आश्चर्य के साथ खाई । वे फ्रांस के थे । जब पिताजी से चौथे घंटे में पूछा कि अब और कितना पढ़ाओगे तो वे बोले मैं इनसे फ्रेंच पढ़ रहा हूं ।और हिंदी सिखा रहा हूं । और बोले देखना है भारत का शिक्षक हारता है या फ्रांस का छात्र पढ़ने पढ़ने में । ये बात जब उन छात्रों ने अपनी भाषा में सुनी तो वे हार मान बैठे । उन्होंने पिताजी से फ्रेंच में माफी मांगी और भारतीय शिक्षक को नमन किया ।
वे मेरे पिता से कुछ सीख कर गए और कुछ सिखाकर गए । पिताजी एक आदर्श शिक्षक थे । जो डिग्री कालेज के प्राचार्य होने केबाद भी प्रत्येक छात्र से कुछ न कुछ सीखने की ललक में देखे जाते थे ।उनका अपना सिद्धान्त था स्वतंत्र विकास का जिसे वे बाहर बालों पर कम मगर घर में पूरी तरह से लागू करते थे ।
उन्होंने प्राइमरी से लेकर डिग्री तक की कक्षाएं लें मगर एक भी छात्र को सजा नहीं दी ।
ऐसे शिक्षक को नमन ।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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