
रामलीला मंचो पर रावण दशरथ और भगवान परशुराम का किरदार निभाने वाले डा सूरज पाल सिंह नही रहे..!
विनम्र श्रद्धांजलि
एटा। 1970 के दशक से 1990 तक राम लीला मंचों पर लंकाधिपति रावण, महाराजा दशरथ,भगवान परशुराम एवं राजा हरिश्चंद्र जैसे पौराणिक किरदार निभाने वाले डा सूरज पाल सिंह नही रहे।14 अगस्त की शाम आगरा के एक ट्रामा सेन्टर में हार्ट अटैक पडने के कारण उपचार के दौरान दुखद निधन हो गया। डा. सूरजपाल सिहं एटा शहर स्थिति मुहल्ला रैबाडी के रहने वाले थे। सामाजिक क्षेत्र में अपनी क्रांतिकारी अभिनय कला से उन्होंने अलग पहिचान बनाई थी। उनके निधन की खबर सुनते ही उनकी प्रतिभा के अलग अलग पन्ने एक एक कर सामने आने लगे। उनके समकालीन सामाजिक जनों को सहज पता होगा डा सूरज पाल को पटकथा संवाद लेखन,उपन्यास आदि लिखने का भी शौक था। हमारे निजी जीवन में 1992 तक संपर्क रहे डा सूरज पाल बेहद भरोसे और विश्वास की प्रतिमूर्ति थे। यही कारण था तत्कालीन स्थानीय राजनीतिज्ञों को उनकी जरूरत होती थी वे प्रख्यात वकील स्व कृपाशंकर वार्ष्णेय की सामाजिक टीम के अग्रणी सदस्य रहे। क्योंकि इस दौर में वकील साहब का यह दल कृष्ण लीला राम लीला कवि सम्मेलनों की सक्रियता बनाए रखता था जिसमे स्थानीय कलाकारों एवं अन्य क्षेत्रों की प्रतिभा को तरजीह दी जाती थी।डा सूरज पाल अपने अभिनय कौशल से बेहद लोकप्रिय हो गए रावण का किरदार निभाते हुए जब तक मंच का तख्त न टूटे तब बात नही बनती थी सो यह देखने के लिए दर्शक एकटक मंच पर नजर गड़ाए रहते थे। विश्वास और भरोसा कायम रखना डा सूरज पाल सिंह की शख्सियत की खासियत थी। हमे अच्छी तरह याद है 1991-92 की वह घटना जिसमे उन्होंने छुपा हुआ साथ दिया और इन पंक्तियों के लेखक को सुरक्षित गंतव्य तक पहुंचाया..! शायद इस उपकार कोई सनद नही दी जा सकती बड़े भाई श्री अरुण दीक्षित के मानस पटल संभव है यह उनका रोल अंकित हो.. परंतु घटना का स्मरण कर डा सूरज पाल के योगदान को याद किया जा सकता।
ऐसे अभिनेता एक्टिविस्ट भरोसेमंद शख्सियत का यूं चले जाना साल रहा है।यूं तो जीवन मृत्यु का संग इस सृष्टि का अनवरत क्रम है। पर ऐसे में श्रद्धांजलि के रूप में एक अनजानी बिन देखी आस जगाती शायर असलम अंसारी का एक शेर अदा करना मौजूं लगता
है:तू जा ! जाने वाले को कौन रोक सकता है।
आज चलेंगे, तभी तो हम फिर मिल संकेगे।
अलविदा डा सूरज पाल सिंह