@, दीप्ति की कलम से—-
सरकारी कर्मचारियों की पुरानी पेंशन बुढ़ापे की रोजी रोटी और वैसाखी भी है—–

जनहित के कार्यों में पत्थर पर लकीर नहीं होनी चाहिए बदलते प्रवेश के साथ एजेंडे भी बदलने चाहिए 100% प्रतिशत तों कोई भी इंसान नहीं होता है मेरा मतलब है 2005 या 8मे अटल बिहारी वाजपेई जी ने सरकारी कर्मचारियों की पेंशन खत्म कर दी थी आज भाजपा अच्छे कार्यों को करते हुए इस कार्य को बरकरार बनाए हुए हैं अंशदान बुढ़ापे के लिए यह सरकार की खैरात है या कर्मचारियों की मेहनत मिया की —वही कहावत—बुढ़ापे की लाठी है पेंशन निवाला है इस पर कर्मचारियों का पूर्ण अधिकार बनता है जब पूरी जवानी कर्मचारी सरकार की नौकरी करता है और बुढ़ापे में जब उसको जरूरत होती है पैसों की तब सरकारी कर्मचारियों को दूध जैसी मक्खी निकाल कर फेंक दिया जाता है यह कहां का न्याय है बुढ़ापे के बदलते परिवेश में रिस्तों की सोच सिर्फ बसीयत तक ही रह गई है फिर ये बुढ़ापे के लिए सरकारें रिस्तों से कम दोषी नहीं है वृद्धा आश्रम जैसा वनवास देने मे सवाल बिचारणीय है पुरानी पेंशन का मुद्दा, हम यह नहीं कहते कि मौजूदा सरकारें कार्य अच्छा नहीं कर रही है पर हजार अच्छे कार्यों पर यह मुद्दा भारी पड़ सकता है गरीब बेरोजगार बुढ़ापे के लिए साधन 1000रू,पेंशन देकर महंगाई की सोच से भी देखने की आवश्यकता है आज हजार रुपए में एक थैला सब्जी नहीं आती है बड़े घरों में, आप अनाथ लावारिस बुढ़ापे को तीन तीन चार चार महीने में एक हजार–500 रुपए देकर उनके जीवन का साधन दे रहे हैं विचारणीय है मौजूदा सरकारों को समय रहते विचार करना चाहिए सरकारी कर्मचारी का पुरानी पेंशन पर पूर्ण अधिकार है क्योंकि बुढ़ापे का साधन और बैसाखी है।