एआईसीटीई द्वारा 2371 तकनीकी कालेजों की मान्यता समाप्ति सराहनीय कदम—डा रक्षपाल सिंह चौहान

एआईसीटीई द्वारा 2371 तकनीकी कालेजों की मान्यता समाप्ति सराहनीय कदम—डा रक्षपाल सिंह चौहान
अलीगढ़ ।25 जुलाई 2020
प्रख्यात शिक्षाविद, धर्म समाज कालेज, अलीगढ़ के विभागाध्यक्ष रहे व औटा के पूर्व अध्यक्ष डा रक्षपाल सिंह चौहान ने केन्द्रीय सरकार के विधिक संस्थान ए आई सी टी ई (अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद) द्वारा मान्यता प्राप्त देश के 10992 में से दुर्व्यवस्थाग्रस्त एवं नियमों को ताक पर रख कर संचालित हो रहे इंजीनियरिंग- मैनेजमैंट आदि पाठ्यक्रमों के 2371 कालेजों को तत्काल प्रभाव से बन्द किये जाने के फैसले को बहुत सराहनीय एवं प्रशंसनीय करार देते हुए गुणवत्तापरक तकनीकी उच्च शिक्षा के लिए मील का पत्थर बताया है । डा सिंह ने कहा है कि नियमों की घोर अनदेखी करके संचालित होने वाले उक्त घटिया संस्थानों के बारे में उनके द्वारा दिनांक 6 जून 2017 को पत्र लिखकर केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री जी से शिकायत की गई थी जिसके परिणामस्वरूप मंत्रालय के अंडर सेक्रेटरी श्री डी सी लाकरा ने मुझे प्रेषित अपने पत्र दिनांक 30 जून 2017 के द्वारा अवगत कराया गया था कि ए आई सी टी ई नियमों की अनदेखी करने वाले टेक्निकल कालेजों के विरुद्ध निश्चित तौर पर कार्रवाई करेगी। 2371 तकनीकी कालेजों की मान्यता समाप्ति का आदेश उसी आश्वासन का परिणाम है।
असलियत में आज बेहद खुशी का दिन है। इसके लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय एवं उसके अधीन कार्यरत ए आई सी टी ई बधाई की पात्र है। उसकी जितनी प्रशंसा की जाये वह कम है।
डा.रक्षपाल सिंह चौहान ने कहा है कि एक ओर इस महत्वपूर्ण निर्णय से देश के सभी टेक्नीकल संस्थानों के संचालक पठन पाठन आदि की सुविधाओं की बेहतरी पर ध्यान देंगे।तकनीकी कालेजों के पाठ्यक्रम और उनके प्रबंधन में ए आई सी टी ई की गाइडलाइन्स का पालन करेंगे ,तो वहीं दूसरी ओर इन कालेजों के विद्यार्थियों को गुणवत्तापरक शिक्षा प्राप्ति हेतु वातावरण मिलेगा। यह तकनीकी पाठ्यक्रम के अधीन अध्ययनरत छात्रों के लिए बड़ी उपलब्धि है।
पूर्व औटा अध्यक्ष ने ए आई सी टी ई को पत्र लिखकर उक्त निर्णय के लिए धन्यवाद देते हुए अनुरोध किया है कि सभी मान्यता प्राप्त संस्थानों के संचालन की सतत निगरानी एवं उनके पारदर्शी मूल्यांकन की व्यवस्था प्रत्येक 5 वर्ष के अन्तराल पर हो जिससे आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाए जाते रहें ।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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