
गरीबी उन्मूलन ने हमें विकसित देशों की कतार में खड़ा किया
नीति आयोग ने 2015-16 से 2019-21 के बीच देश में बहुआयामी गरीबी से निपटने में मिली सफलता की जो तस्वीर पेश की है, वह यकीनन खुश करने वाली है। इस दौरान न सिर्फ 13.5 करोड़ लोग गरीबी-रेखा से ऊपर उठे, बल्कि संतोषजनक बात यह है कि बीमारू माने जाने वाले राज्यों, बिहार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश ने इस दौरान सबसे बेहतर प्रदर्शन किया है। साल 2015-16 में 24.9 प्रतिशत लोग बहुआयामी गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर कर रहे थे, पर 2019-21 में यह आंकड़ा घटकर 15 फीसदी रह गया। बमुश्किल एक हफ्ता बीता होगा, जब यूएनडीपी और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक अध्ययन रिपोर्ट ने बताया था कि पिछले पंद्रह वर्षों में करीब 41.5 करोड़ भारतीयों को बहुआयामी गरीबी से निजात दिलाने में भारत कामयाब रहा। नीति आयोग के इंडेक्स में यूएनडीपी की रिपोर्ट के संकेतकों को तो आधार बनाया ही गया, दो अन्य संकेतक भी उनमें जोडे़ गए- बैंक खातों तक पहुंच और मातृत्व स्वास्थ्य। जाहिर है, ये आंकड़े बता रहे हैं कि देश की आर्थिक उन्नति का लाभ हाशिये के लोगों तक पहुंच रहा है।
निस्संदेह, यह एक सुचिंतित आर्थिक नीति की उपलब्धि है। पिछली सदी के आखिरी दशक में उदारीकरण के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था ने जो उड़ान भरी थी, उसका लाभ अब जमीन पर साफ-साफ दिखने लगा है, मगर हम इस तथ्य को भी अनदेखा नहीं कर सकते कि अब भी 20 करोड़ से अधिक भारतीय बहुआयामी गरीबी-रेखा के नीचे जी रहे हैं, जो एक विशाल संख्या है और दुनिया के कई बड़े देशों की जनसंख्या से अधिक है। नीति आयोग ने पांच वर्षों के दौरान गरीबी से मुक्ति के जो आंकडे़ पेश किए हैं, उसे देखते हुए शेष आबादी को ऊपर उठाने में अधिक वक्त नहीं लगना चाहिए। हालांकि, सामाजिक-आर्थिक उन्नति का गणित इतना सरल होता नहीं है। फिर भी, सरकारों को अपने तईं प्रयास करने ही चाहिए कि जो लोग पीछे रह गए हैं, वे सभी बारह मानकों पर खरे उतर सकें।
इन खुशनुमा तस्वीरों के बीच कुछ चुनौतियां भी हैं। राज्य सरकारों को अपने आर्थिक संतुलन का भी ध्यान रखना चाहिए। बेशक लोक-लुभावन नीतियों व कार्यक्रमों का लाभ अंततोगत्वा मध्यवर्ग और गरीबों को मिलता है, मगर उस लाभ की सार्थकता होनी चाहिए। आधारभूत संरचनाओं के विस्तार और संकटकालीन स्थितियों के मद्देनजर राज्यों को अपने-अपने खजाने की भी चिंता करनी चाहिए। सरकारों को यह ख्याल रखना चाहिए कि राजनीति वही सराही जाती है, जिसमें दूरदर्शिता होती है, और जिसकी निरंतरता को भंग करने का दुस्साहस प्रतिपक्ष भी न कर सके। इस समय लोक-लुभावन नीतियों का जो दौर चल पड़ा है, उससे कई राज्यों का आर्थिक संतुलन बिगड़ रहा है और नीति आयोग व वित्त आयोग उन्हें इस संदर्भ में लगातार आगाह भी करता रहा है। गरीबी उन्मूलन एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य है, इसमें सफलता हमें विकसित देशों की कतार में ले जाएगी। मगर यह भी ध्यान रखना होगा कि जिनको इस रेखा से ऊपर उठाया गया है, वे फिर से उसी खाई में न लुढ़कें। मुफ्त अनाज बांटने व लोक-लुभावन कार्यक्रमों से हम भूख व गरीबी के आंकड़े तो दुरुस्त कर लेंगे, पर जब तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य तक सबकी पहुंच नहीं बन सकेगी, तब तक तमाम दावों पर सवाल बना रहेगा। विकसित देश बनने के लिए इन सफलताओं को सार्थक रूप भी देना होगा।