कई पिता ऐसे है जो कई साल से रह रहे है, जिनसे अब कोई भी मिलने नहीं आता, रिपोर्ट योगेश मुदगल

एटा, । ‘बेटे को रखा छांव, खुद धूप में जलते रहे, गिरा के अपने आंसू हंसाते रहे बेटे को, जिनसे थी बुढापे पर लाठी बनने की उम्मीद, उन्हीं हाथों ने पहुंचा दिया वृद्धा आश्रम’ बेटे के व्यवहार ने वृद्धाश्रम में रह रहे पिता को झकझोर कर रख दिया। वर्षों से रहे पिता अब अपने बेटों का नाम लेना भी उचित नहीं समझते है। सिसकती हुए वृद्ध कहते है कि अब बेटा त्यौहार पर भी मिलने नहीं आते है।
रविवार को फादर डे है। इस अवसर पर कोई पिता का सोशल मीडिया पर फोटो लगाकर शुभकामनाएं देगा तो कोई पिता को उपहार देगा। इन सब के बीच कुछ पिता ऐसे भी होंगे जिन्हे कोई भी शुभकामनाएं देने या फिर उपहार देने वाला नहीं होगा। कासगंज रोड पर आवासीय वृद्धाश्रम है। इसमें वर्तमान में 27 वृद्ध रह रहे है। बेटों से मनमुटाव, घर से निकाले जाने के बाद वृद्ध आश्रम में रहने पहुंचे। कई वृद्ध ऐसे है जो कई साल से रह रहे है, जिनसे अब कोई भी मिलने नहीं आता है। इसके बाद वृद्ध भी अपने बेटों का नाम भी लेना उचित नहीं समझते है। आश्रम में मिले स्टाफ से प्यार के बाद वह उन्हीं को अपना परिवार समझते है। कुछ वृद्ध ऐसे भी है कभी-कभी घर पर घूम भी आते है।
चार साल से वृद्धाश्रम में रहे हैं। यह बताते है कि दो बेटे है जिसमें एक दिल्ली में नौकरी करता है और एक गांव में रहता है। दोनों में कोई भी बेटा मिलने नहीं आता है। घर में रोज-रोज की कलह के कारण वृद्धाश्रम में आ गए। कोई भी मिलने नहीं आता है।
ओम नव देव
पांच साल से वह वृद्धाश्रम में रह रहे है। बेटे त्यौहार पर भी मिलने नहीं आते है। परिवार से ज्यादा सुख वृद्धाश्रम में मिलता है। जिन बच्चों को पालकर पैरों पर खड़ा किया। आज वही बुढ़ापे में उनकी लाठी नहीं है।
सूबेदार सिंह
वृद्धाश्रम में रहने वाले सभी वृद्ध, वृद्धाओं को अच्छे से ख्याल रखा जाता है। यही कारण है कि आश्रम में रहे वृद्धजनों को अपने घर की याद नहीं सताती है। सभी सुविधाएं आश्रम में मुहैया कराई जा रही है। समय-समय मेडिकल चेकअप तथा खान-पान का ध्यान रखा जाता है।
मिथलेश कुमारी, वार्डन, आवासीय वृद्धाश्रम कासगंज रोड एटा।