परम्परागत कृषि विधियों को अपनाने हेतु विस्तृत सुझाव एवं संस्तुतियों सहित एडवाइजरी जारी

जिलाधिकारी अंकित कुमार अग्रवाल के निर्देशन में जिला कृषि अधिकारी ने किसान भाइयों हेतु जारी की एडवाइजरी

एटा, 18 मई 2023 (सू0वि0)। जिलाधिकारी अंकित कुमार अग्रवाल के निर्देशन में जिला कृषि अधिकारी मनवीर सिंह ने जनपद के किसान भाइयों को सूचित किया है कि फसलों में प्रतिवर्ष कीट/रोग एवं खरपतवार नाशी से होने वाली क्षति एवं कृषि रक्षा रसायनों के अविवेक पूर्ण प्रयोग से स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव के दृष्टिगत परम्परागत कृषि विधियों को अपनाने हेतु विस्तृत सुझाव एवं संस्तुतियों सहित एडवाइजरी जारी की गई है। उन्होंने बताया कि मेड़ो पर उगने वाले खरपतवारों की सफाई से किनारों की प्रभावित फसलों के बीच खाद एवं उर्वरक की प्रतिर्स्पधा कम हो जाती है, खरपतवारांे को आगामी बोई जाने वाली फसल में फैलने से रोका जा सकता है। मेंडो पर उगे हुये खरपतवारांे को नष्ट करने से हानिकारक कीटों एवं सूक्ष्म जीवों के आश्रय स्थल नष्ट हो जाते है जिससे अगली फसल में इनका प्रकोप कम हो जाता है। सिचांई के जल को खेत में रोकने में सहायता मिलती है।

कृषि अधिकारी ने बताया कि ग्रीष्म कालीन गहरी जुताई करने से मृदा की संरचना में सुधार होता है जिससे मृदा की जलधारण क्षमता बढती है जो फसलों के बढवार के लिए उपयोगी होती है। खेत की कठोर परत को तोड कर मृदा को जड़ो के विकास के लिये अनुकूल बनाने हेतु ग्रीष्म कालीन जुताई अत्यधिक लाभकारी हेै। खेत में उगे हुये खरपतवार एवं फसल अवषेश मिटटी में दब कर सड जाते है जिससे मृदा मेेें जीवाश्म की मात्रा बढती है। मृदा के अन्दर छिपे हुये हानिकारक कीट जैसे दीमक, सफेद गिडार, कटुया, बीटिल एंव मयगेट के अण्डे लार्वा व प्यूपा नश्ट हो जाते है जिससे अग्रिम फसल में कीटों का प्रकोप कम हो जाता है। गहरी जुताई के बाद खरपतवारों जैसे पत्थर चटा, जंगली चौलाई, दुद्धी, पान पत्ता/रसभरी सवां, मकरा, आदि के बीज सूर्य की तेज किरणों के सम्पर्क में आने से नष्ट हो जाते हैं। गर्मी की गहरी जुताई के उपरान्त मृदा में पाये जाने वाले हानिकारक जीवाणु (इरवेनिया राइजोमोनास स्ट्रेप्टोमाइसीज आदि) कवक (फाइटोप्थोरा, राइजोकटोनिया, स्कलेरोटीनिया, पाइथियम, वर्टीशिलियम, आदि) निमेटोड (रूटनोट,) एवं अन्य हानिकारक सूक्ष्म जीव मर जाते है जो फसलों में बीमारी के प्रमुख कारण होते है। जमीन में वायु संचार बढ जाता है जो लाभकारी सूक्ष्म जीवों की बृद्धि एवं विकास में सहायक होता है। मृदा में वायु संचार बढने से खरपतवारनाशी एवं कीटनाशी रसायनों के विशाक्त अवषेश एवं पूर्व फसल की जडों द्वारा छोडे गये हानिकारक रसायन सरलता से अपघटित हो जाते है।

उन्होंने कहा कि रबी फसलों की कटाई के उपरान्त फसल अवषेश भुमि के अन्दर एवं भूमि के ऊपर उपलब्ध होते है इनको लगभग 20 किग्रा यूरिया प्रति एकड की दर से अथवा डीकम्पोजर मिटटी में मिला देने से 20-30 दिन के भीतर यह अवषेश सड कर कार्बनिक पदार्थ में बदल जाते है जिसके फलस्वरूप् मृदा की उर्वरा शक्ति बढ जाती है। फसल अवशेष न जला कर मिटटी में मिलाने से फसल अवशेष कम्पोस्ट खाद बनाने में सहायक है। जो कि मृदा की भौतिक, रसायनिक एवं जैविक क्रियाओं में लाभदायक है। पादप अवशेष मल्च के रूप में प्रयोग करने से मृदा की जलधारण क्षमता बढती है एवं खरपतवारोें को उगने से रोकता है। मृदा वायु संचार की बढोत्तरी होती है। तो वहीं जैविक फफूंदनाशक ट्राइकोडर्मा 2.5 किग्रा को 65-75 किग्रा गोबर की सडी खाद में मिला कर हल्के पानी का छीटा देकर 08-10 दिन तक छाया में रखने के उपरान्त बुवाई के पूर्व आखिरी जुताई पर भूमि में मिला देने से फफूंद से फैलने वाले रोग जैसे- जड गलन, तना गलन, उकुठा एवं झुलसा का नियंत्रण हो जाता है। व्यूवेरिया वेसियाना 1 प्रति0 बायोपेस्टीसाइड की 2.5 मात्रा प्रति है0 65-75 किग्रा गोबर की खाद में मिला कर हल्के पानी का छीटा देकर 08-10 दिन तक छाया में रखने के उपरान्त बुवाई के पूर्व आखिरी जुताई पर भूमि में मिला देने से दीमक, सफेद गिडार, कट वर्म एवं सूत्र क्रमि का नियंत्रण हो जाता है।

उन्होंने कहा कि बुवाई से पूर्व 2.5 ग्राम थीरम 75 प्रति0 डी.एस. अथवा कार्बेन्डाजिम 50 प्रति0 ूच 2 ग्राम अथवा थीरम 75 प्रति 02 ग्राम एवं कार्बेन्डाजिम 50 प्रति0 ूच अथवा यथासंभव ट्राइकोडर्मा 04 से 05 ग्राम प्रति किग्रा बीज की दर से षोधित करके बुवाई करने से बीज जनित रोग जैसे बीज गलन उकठा का नियंत्रण हो जाता है।

About The Author

निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

Learn More →

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

अपडेट खबर के लिए इनेबल करें OK No thanks