

18 हजार ब्राह्मण मतदाताओं की नाराजगी से बिगड़े भाजपा प्रत्याशी के चुनावी समीकरण
भाजपा के सांसद, विधायकों की प्रतिष्ठा दांव पर प्रचार में जी-जान से जुटे
-आपसी वैमनस्यता परे रख मीरा गांधी की झोली भरेंगे ब्राह्मण,
-रोज सभाओं के दौर जारी, लेकिन अभी तक झुकने को तैयार नहीं
-ब्राह्मण वोट कटने से सपा प्रत्याशी की स्थिति हुई मजबूत
एटा। जनपद की राजनीति से ब्राह्मणों का पत्ता साफ करने की रणनीति से खफा ब्राह्मण समाज के 18 हजार वोटर भाजपा से खफा हो गये हैं जिससे नगर निकाय चुनाव में भाजपा प्रत्याशी के चुनावी समीकरण डगमगा गये हैं। इस बार ब्राह्मण समाज इस कदर नाराज है कि वह आपसी वैमनस्यता को परे रख निर्दलीय प्रत्याशी मीरा गांधी की एकमुश्त झोली भरने जा रहा है। वर्षों से आपसी दुश्मनी निभा रहे एक दूसरे के कट्टर दुश्मन होते हुए भी समाज की ताकत राजनैतिक दलों को दिखाने की आतुरता से गोलबंदी की गई है। पहले यह होता था कि आपसी दुश्मन कभी एक पार्टी को वोट नहीं देते थे। एक सपा में होता था तो दूसरा दुश्मन भाजपा होता था, लेकिन इस बार ब्राह्मण समाज के पास मीरा गांधी के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
मीरा गांधी के पक्ष में गोलबंदी का भी कारण है कि भाजपा को वोट देकर भी ब्राह्मण समाज राजनैतिक संरक्षण विहीन है। एक भी सांसद और विधायक ब्राह्मण समाज के लोगों की मुसीबत में सहायता नहीं करता यह चर्चा आम है। जातियता का भाव सांसद और विधायकों में चरम पर है। दूसरा कारण उच्च शिक्षित भाजपा प्रत्याशी सुधा गुप्ता के पति पंकज गुप्ता एडवोकेट की ख्याति भाजपा के संगठन और राष्ट्रीय नेताओं में हो सकती है लेकिन एटा शहर में वोटरों के बीच नहीं है। जबकि मीरा गांधी पिछले कार्यकाल में शहर की गलियों में सफाई कार्य कराते हुए भी देखी गईं हैं, उनके पति राकेश गांधी की सहज उपलब्धता भी चुनाव में लड़ रहे सभी प्रत्याशियों पर भारी पड़ती दिखाई दे रही है।
समाजवादी पार्टी की प्रत्याशी मुन्नी बेगम को मुस्लिम समाज जोरदारी से चुनाव लड़ा रहा है, यदि यादव मतदाताओं ने पार्टी प्रत्याशी को एकमुश्त वोट दिया तो कोई आश्चर्य नहीं होगा कि वह दूसरे नम्बर की लड़ाई में भी शामिल हो जायें। लेकिन समाजवादी पार्टी का प्रबंधन पिछले नगरपालिका चुनावों से अलग नहीं हो पा रहा है। लगता है कि सपा के जिला स्तरीय पदाधिकारी यह मान बैठे हैं कि हमें सिर्फ मुस्लिम और यादव मतदाताओं के अलावा अन्य जातियों का वोट नहीं मिल सकेंगे। सपा नेताओं की यह सोच ही उन्हें पिछले कई चुनावों में पराजय का मुंह दिखाती है। सपा नेता सिर्फ यादव और मुस्लिम वोटर पर ही मेहनत करते हैं दूसरी जातियां जिनकी वोटर संख्या 2 से 5 हजार के बीच है उन पर उनका ध्यान ही नहीं जाता और दूसरे प्रत्याशी सपा चुनाव प्रबंधन की कमी का फायदा उठाकर विजयश्री की वरण कर लेते हैं।
कांग्रेस प्रत्याशी सीमा गुप्ता वैश्य वर्ग से होने के कारण कुछ प्रतिशत मतों का नुकसान भाजपा प्रत्याशी का ही करेंगी।
आम आदमी प्रत्याशी राजकुमारी यादव यूं तो अपने कुछ सहयोगियों के साथ चुनाव मैदान में हाथ पैर मार रही हैं लेकिन उनके अपनी पार्टी के पदाधिकारियों से ही मतभेद इस कदर हैं कि वे प्रत्याशी के बारे में बात ही नहीं करते।
चेयरमैन पद के सभी प्रत्याशी यूं तो जीत का दावा कर रहे हैं लेकिन मुख्य मुकाबला मीरा गांधी के साथ ही होगा। भाजपा और समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी मुख्य लड़ाई में दिखाई दे रहे हैं। चुनाव से एक दो दिन पूर्व और स्थिति साफ होगी क्योंकि अभी तक तो रूठने और मनाने का दौर चल रहा है। कुछ प्रत्याशी चुनाव तो लड़ रहे हैं लेकिन मुफ्त में ही चुनावी मैदान जीतना चाह रहे हैं वहीं भाजपाई प्रशासन के भरोसे जीतने का सपना देख रहे हैं। देखना है चुनावी ऊँट किस करवट बैठता है, विजयश्री किसका वरण करती है? लेकिन कुछ भी हो नगरपालिका के चेयरमैन का चुनाव बड़े ही रोमांचक दौर में पहुंच गया है। शहर की चाय की दुकान हो या परचून की हर जगह दगाबाजों की चर्चाएं भी चल रहीं हैं तो वहीं ऐसे प्रत्याशियों को नकारने की बातें भी हो रही हैं जो कभी जनता के किसी आम आदमी से कभी मिले ही नहीं और उन्हें आज उसी आम आदमी से वोट मांगना पड़ रहा है जिससे कभी उन्होंने पद पर रहते हुए समझा ही नहीं।