सिम्बल के सहारे,क्या करें नेताजी बेचारे

जैसे जैसे मौसम में गर्माहट होती जा रही है वैसे वैसे निकाय चुनाव का मौसम का तापमान भी बढ़ता जा रहा है,,नेता कुर्सी के लिए पार्टी छोड़ रहे और पकड़ रहे है/// चुनाव आते ही नेताओ का रूप भी दिखने लगता है// नेता अपना रंग दिखाना शुरू कर देते है// और नेताओं का काम है सत्ता कायम रखना या हासिल करना///उसके लिए चाहे पार्टी ही क्यो न छोड़नी या बदलनी पड़े///लेकिन नेता जी कुर्सी पर बैठकर रहेंगे///अब सवाल खड़ा होता है की आखिर नेताओ को खुद से और जनता से ज्यादा किसी पार्टी सिम्बल पर भरोसा क्यो होता है//क्या किसी राजनीति पार्टी के सिंबल पर ही चुनाव जीता जा सकता है///, क्या नेताओ में खुद का वजूद कुछ भी मायने नही रखता/ कुर्सी के लिए सिम्बल का सहारा ही क्यो लेते है नेताजी// नेता जी अगर आपने विकास किया है या करना चाहते है तो सिम्बल और पार्टी से ज्यादा जनता पर भरोसा करना पड़ेगा///जनता को पार्टी का झंडा लगाकर रौब दिखाकर लग्जरी गाड़ियों में नही घूमना है,जनता को बिजली, सड़क,पानी, शिक्षा व्यवस्था आदि से मतलब होता है,/// और जनता को भी इस बात को बखूबी समझना चाहिए /// नेता जैसे तैसे भी आपके पास 20 दिन हाथ जोड़ने आएंगे और फिर पूरे 5 साल के लिये आपसे दूर भी हो जाएंगे,आपके द्वारा 15 दिनों में सोचसमझ लिया गया फैसला आपका , समाज का और नगर का भाग्य बदल सकता है, इसलिए जनता को किसी पार्टी के प्रत्यासी या निर्दलीय प्रत्यासी को ध्यान से वोट करना चाहिये, नेता ऐसा होना चाहिए जिससे हम किसी भी टाइम किसी समस्या को लेकर अपनी बात कह सके,मिल सके, जीतने के बाद नेता में पक्षपात करने की शक्ति कम हो। और सबसे बड़ी बात यह है की कंही नेता अपने वर्चस्व और विकास के लिए कुर्सी को तो हासिल नही करना चाह रहा///इन सब बातों को ध्यान में रखकर वोट करना चाहिए ताकि आने वाले 5 सालों तक आपको पछताना न पड़े////और ह ये बात बहुत ज्यादा ध्यान रखनी पड़ेगी की जो नेता कुर्सी के लिए इधर से उधर हो जाते है वो जीतने के बाद किधर जाएंगे, क्या आपसे किया हुआ वादा निभा पाएंगे ये फैसला आपको करना है/////।धन्यवाद।