
धार्मिक और सांस्कृतिक आदर्शों से जुड़े प्रतीक, त्योहार और परंपरा में उग्रता कितनी घातक हो सकती है, इसका एहसास हमें खूब है
हमारे सामाजिक जीवन में शक्ति-प्रदर्शन का स्थायी महत्व है। सभी लोग ताकतवर या रसूखदार से ही संबंध बनाए रखने में अपनी भलाई समझते हैं। आमजन में यह भरोसा काफी कम है कि शक्तिहीन के साथ न्याय होगा। यही वजह है कि हम अपनी सामाजिक जिंदगी में निजी और सामूहिक स्तर पर शक्ति-प्रदर्शन के अवसरों की तलाश में रहते हैं। इसे तो अब अपने तीज-त्योहार और आस्था में कर्मकांड के रूप में शामिल कर लिया गया है। यही वजह है कि हर तीन-चार महीने के बाद कोई न कोई ऐसा पारंपरिक पर्व या अवसर आता है, जिसमें समाज के अंदर के उप-समूह अपनी-अपनी दावेदारी पेश करते रहते हैं।
हमारे यहां धार्मिक जुलूसों और आयोजनों का एक सामाजिक संदर्भ भी है। हम इसे अपनी आस्था का प्रदर्शन तो बताते ही हैं, इसमें हम अपनी ताकत का प्रदर्शन भी करते हैं। इसी कारण, जब कोई त्योहार सामने आता है, तो धर्म को मानने वालों से ज्यादा कानून और व्यवस्था चलाने वालों की नींद उड़ जाती है।
हाल के दिनों में हमने यह भी देखा है कि बगैर किसी उत्तेजना या स्पष्ट कारण के सांप्रदायिक व सामुदायिक अस्मिता का उग्र प्रदर्शन किया जा रहा है। आखिर ऐसी उग्रता की जरूरत क्यों है? जबकि, इंसान शांतिपूर्ण जीव है और सामुदायिक जीवन में शांति व युद्ध की स्थिति में शांति का पलड़ा ही भारी रहता है। मगर शांति के दो आधार होते हैं- पहला, शांति तब संभव है, जब हम एक-दूसरे के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करें, और दूसरा, जब समाज में प्रतिरोध या दावेदारी नहीं हो, यानी सबकी मौन स्वीकृति हो। देखा यही गया है कि असंतुलन की स्थिति में उग्रता की जरूरत पड़ती है, इसीलिए समाजशास्त्रियों का सुझाव होता है कि अगर समाज में अकारण हिंसा, उग्रता या उद्दंडता की प्रवृत्ति दिख रही है, तो इसका मतलब है कि समाज को संचालित करने वाले संस्थान या नियमों में सुधार की जरूरत है। यह महज इंसानों के अंदर के पशु के प्रबल होने का संकेत नहीं है, बल्कि यह बताता है कि हमारा समाज कमजोर पड़ता जा रहा है। इसीलिए संकेतों में यह सुझाव दिया जाता रहा है कि जिस समाज में द्वंद्व और तनाव को सुलझाने के शांतिपूर्ण रास्ते बंद हो गए, उस समाज को जाग जाना चाहिए, क्योंकि वह अराजकता की ओर बढ़ रहा है, और कोई भी समाज अराजक जिंदगी को बहुत दिनों तक बर्दाश्त नहीं कर सकता।
धार्मिक और सांस्कृतिक आदर्शों से जुड़े प्रतीक, त्योहार और परंपरा में उग्रता कितनी घातक हो सकती है, इसका एहसास हमें खूब है। हमने इस्लाम को आतंकवाद से जुड़ते देखा है, तो खालिस्तान आंदोलन के समय सिख धर्म का रिश्ता अलगाववादियों से बताने का शर्मनाक परिणाम पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश भर में सिख-हिंसा के रूप में भुगता है। आजकल हिंदू धर्म के मानने वालों में अप्रत्याशित उग्रता का माहौल है। रामनवमी जैसे सौजन्यतापूर्ण आयोजन भी आक्रामक जुलूस में बदलने लगे हैं, जिसका एकमात्र मकसद अन्य धर्मावलंबियों, खासतौर से मुसलमानों को अपनी ताकत दिखाना होता है। यह बेहद चिंता की बात है। इससे बाकी धर्म के लोग भी शिष्टता के बजाय अशिष्ट आचरण का सहारा लेने लगेंगे।
भारतीय समाज की यह दशा बहुत चिंतनीय है। ऐसी परिस्थिति अंग्रेज राज के समापन के समय भी पैदा हुई थी, जिसकी कीमत हमने हिन्दुस्तान के बंटवारे के रूप में चुकाया है। अगर हमारा धर्म नीति, नैतिकता और न्याय का वाहक नहीं रह जाएगा, तो धर्म व अधर्म के बीच का फर्क खत्म हो जाएगा। फिर प्रह्लाद और उसके राक्षस पिता हिरण्यकश्यप के बीच भला क्या अंतर रह जाएगा? द्रौपदी, दुर्योधन और युधिष्ठिर के बीच जो बुनियादी फासला है, उस पर भला कैसे भरोसा करेंगे? राम और रावण के बीच में सीता आखिर राम की क्यों प्रतीक्षा करेगी?
सवाल महज धर्मों के बीच का नहीं है। धर्म के अंदर भी कमजोर और मजबूत के रूप में भेद कायम है। भारतीय संस्कृति में पिछली कुछ शताब्दियों में दबंग जातियों का प्रभुत्व बढ़ा है। इसमें लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं, विशेषकर चुनावी पद्धति ने आग में घी डालने का काम किया है। इसका परिणाम यह निकला है कि जातिगत हिंसा हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अनिवार्य दोष बन गई है। हम अन्य जातियों की छोटी-छोटी घटनाओं या बातों पर भी हिंसा का प्रदर्शन करने लगे हैं। दूसरी जातियों की खुशियों से हमें जलन क्यों होनी चाहिए? दिक्कत यह है कि सिर्फ हिंसा नहीं होती, उसका जमकर राजनीतिकरण भी किया जाता है, जो निंदनीय है। वंचित भारत पर प्रभु वर्ग के व्यवहार पर सत्ता-प्रतिष्ठान अमूमन खामोश रह जाता है, ताकि चुनाव पर उसके असर को परख सके। हमें लैंगिक हिंसा को भी इसी श्रेणी में रखना चाहिए। औरत होने की सजा हमारे समाज का सबसे शर्मनाक पक्ष है, जिस पर चिंतन आवश्यक है। इसमें सिर्फ पुलिस पर भरोसा करने से काम नहीं चलेगा। हमें समाज के जरूरी संस्थानों को भी निगरानी के दायरे में लाना होगा। समाज का प्रभुत्वशाली वर्ग वंचित भारत (स्त्री, दलित, आदिवासी, पिछड़े आदि) के साथ न्यायसंगत, यानी शिष्टाचार या नीतिगत सम्मान का आचरण नहीं कर पाया है, जो हमारे स्वराज्य का अंधकार पक्ष है। जब तक यह स्थिति बनी रहेगी, हमारा लोकतंत्र दोषपूर्ण माना जाएगा।
हमें मौजूदा समय की हिंसा, उग्रता या उद्दंडता की घटना को तात्कालिक नहीं, बल्कि दीर्घकालिक पणिाम की नजरों से देखना चाहिए। अनीति और उग्रता का आधार यदि धर्म बन रहा है, तो सिर्फ उस धर्म में नहीं, उसके अनुयायियों में भी गड़बड़ी है। अक्सर घबराया और डरा हुआ जीव ही हमला करता है। ऐसे में, यदि हम भय के कारण उग्र हो रहे हैं और स्वार्थवश दूसरों के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार कर रहे हैं, तो हम अपने पांव पर खुद कुल्हाड़ी मार रहे हैं। दिखावे की प्रवृत्ति और धार्मिक व संख्या बल का प्रदर्शन कमजोर पड़ते समाज की निशानी है। और, समाज को मजबूती तब तक नहीं मिल सकती, जब तक सद्भाव बढ़ाया नहीं जाएगा। यह भारत में संभव है, क्योंकि शांति का हमारा एक लंबा इतिहास रहा है और अमन-चैन हमारे समाज की आधारशिला है। जब तक यह नहीं होगा, तब तक देश के निर्माण की बात भूल ही जाइए!