
सिंदरी (घनबाद):-8अप्रैल ।श्री राम कथा आयोजक समिति सह नारी सेवा संघ,सिंदरी द्वारा आयोजित श्री राम कथा में भोपाल से आई डॉक्टर अमृता करुणेश्वरी जी ने कथा के छठे दिन की कथा में श्री राम के वन गमन माता कैकई ने जो दो वरदान मांगे उनके पीछे का गूढ़ रहस्य और केवट चरित्र को विस्तारपूर्वक समझाया एक बार महाराज दशरथ जी को अपनी श्रवण यानी कान के पास के केस श्वेत रंग के दिखाई दिए और महाराज दशरथ समझ गए कि अब वह समय आ गया है जब मुझे अपना सारा समय प्रभु की आराधना में लगाना चाहिए और राज्य का काम अपने श्रेष्ठ गुन धारी पुत्र राम को सौंप देना चाहिए । अयोध्या को उसका भावी राजा मिल जाना चाहिए यह विचार करके वशिष्ठ मुनि से मंत्रणा कर श्री राम को युवराज पद पर प्रतिष्ठित करने का निर्णय लिया हम सभी को भी समय रहते अपने कार्यों से निवृत्त होकर वानप्रस्थ संस्कार को धारण करना चाहिए और अपने घर के बहू और बेटों को घर के कामकाज संभलवा कर वृद्धावस्था का अधिक से अधिक समय अपने इष्ट की आराधना में व्यतीत करना चाहिए भक्ति करना चाहिए सात्विक जीवन जीना चाहिए जैसा कि महाराज दशरथ जी ने करने का विचार किया। लेकिन समय की गति को कोई नहीं जानता।इसलिए अयोध्या के राजा बनते बनते राम वन के राजा बन गए परंतु राम के मन में ना तो अयोध्या के राजा बनने का कोई प्रसन्नता थी और ना ही जाने का कोई दुख राम सम अवस्था में थे इसे हमें सीखना चाहिए की जीवन में सुख दुख आते जाते रहते हैं परंतु ना हमें सुखों में ज्यादा भूलना चाहिए और ना ही दुखों में अपना धैर्य खोना चाहिए।माता कैकई ने दो वचन लिए पहले वचन में भरत जी को राजा बनना और दूसरे वचन में गोस्वामी जी वर्णन करते हैं तापस बेष विशेष उदासी चौदह वर्ष राम वनवासी।। माता कौशल्या ने जब जाना कि उनके पुत्र को बिना किसी दोष के जाना पड़ा है 14 वर्ष के लिए तो भैया बहुत दुखी हुई परंतु उन्होंने कहा कि कैकई ने कुछ नहीं कहा महाराज को नहीं रोका तब श्री राम ने कहा की माता ने ही उन्हें कहा है तब कौशल्या जी ने कहा कि यदि यह आज्ञा केवल पिता की होती है तो मैं तुम्हें रोक लेती लेकिन जब माता और पिता की इच्छा और आज्ञा एक ही हो तो तुम्हें वही कार्य करना चाहिए पिता के वचन पालन करने के ही कारण राम श्री राम बने माता सीता और लक्ष्मण भैया अभी श्री राम के साथ जाने के लिए तत्पर हो गए दोनों को श्रीराम ने समझाया की वनवास केवल मेरे लिए आप दोनों के लिए नहीं परंतु दोनों की हठ और स्नेही के कारण श्री राम को उनकी बात माननी पड़ी।श्री राम प्रभु संपूर्ण अवध वासियों से विदा लेकर आगे बढ़े बहुत से अयोध्यावासी भी उनके साथ गए भगवान में सब की ऐसी रहती थी कि कोई भी श्रीराम का साथ नहीं छोड़ना चाहता था परंतु अपने कर्तव्य मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए श्री राम साथ गए अयोध्या वासियों को तमसा नदी के तट पर सोते छोड़ कर आगे बढ़े आगे जाकर वन में उन्होंने अपने मित्र निषाद राज से भेंट की और इससे हम सभी को सीखना चाहिए कि हम सभी को एक साथ प्रेम से रहना चाहिए निषाद राज को हृदय से लगाकर भगवान ने समरसता का संदेश दिया आगे देवी जी ने केवट चरित्र को विस्तारपूर्वक समझाया और कहा कि भट्ट की भक्ति अविरल थी कई जन्मों से पिक केवट प्रभु के चरणों को पकड़कर मुक्ति की इच्छा रखता था केवट अपने पूर्व जन्म में कुछ हुआ था इस रहस्य को बताते हुए देवी जी ने बताया कि भगवान कि नाव मांगने पर कीवर्ड ने पांव पकड़ाई की बात की और अपनी चतुराई से न केवल उसने स्वयं चरणामृत का पान किया अपितु अपने पूरे परिवार और कुटुम का कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर लिया केवट की भक्ति शरणागति की भक्ति है जिसमें दासो अहं कौशलेंद्र के भाव हैं और इस भाव से परमात्मा की सहज प्राप्ति हो जाती है जिस प्रकार की केवट को हुईआज हमारे राम अयोध्या छोड़ चले थे इस प्रकार के भावुक भजनों में वहां उपस्थित सभी लोग भाव विभोर हो गए कई भक्तों के नेत्रों से अश्रु धार बहने लगी।