जब फसलों और किसानों का दुश्मन बनने लगा मौसम, रिपोर्ट योगेश मुदगल

बेमौसम बारिश ने किसानों को चिंता में डाल रखा है। जो नुकसान हुआ है, उसका अनुमान लगाया जा रहा है। कहीं-कहीं 80 प्रतिशत तक नुकसान की चर्चा हो रही है। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? व्यापकता में देखें, तो आज संपूर्ण विश्व जलवायु परिवर्तन और उससे होने वाले दुष्परिणामों से प्रभावित है। एक ओर, जहां हम आधुनिकता और विकासवाद की बात करते हैं, तो वहीं दूसरी ओर, खाद्यान्न सुरक्षा, पोषण सुरक्षा और आर्थिक सुरक्षा को पूरी तरह पाने में हम पिछड़ रहे हैं। एक आंकड़े के मुताबिक, संपूर्ण विश्व में वर्ष 2021 में करीब 2.3 अरब लोग खाद्यान्न सुरक्षा से प्रभावित हुए थे, जो विश्व की आबादी का 29.3 प्रतिशत था। अगर हम पोषण सुरक्षा की बात करें, तो पूरे विश्व में वर्ष 2020 में 3.1 अरब लोग मानक पौष्टिक आहार से वंचित थे, यानी किसानों के पास कोई विकल्प नहीं है, कृषि उत्पादन बढ़ाना ही होगा। किसानों को हौसला बुलंद रखना होगा।
वैज्ञानिकों की मानें, तो समस्या बढ़ सकती है। वैश्विक तापक्रम में लगातार वृद्धि हो रही है। अगले 20 वर्ष में विश्व का तापक्रम 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा बढ़ने की आशंका है। बढ़ती गरमी, अल्प वार्षिक वर्षा, असमय तेज बारिश, ओलापात व आंधी-तूफान की तीव्रता को हम सभी महसूस कर रहे हैं। भारत ही नहीं, विश्व भर में कृषक एक ही मौसम में बाढ़ व सुखाड़, दोनों झेल रहे हैं।
बदलते मौसम के चलते उत्तर प्रदेश, बिहार के कई हिस्सों में मौसम की चरम घटनाएं बढ़ रही हैं। खासकर उत्तर बिहार में जैसा कि वैज्ञानिक तथ्य एवं अनुसंधान बताते हैं कि जलवायु बहुत बदल गई है। अनिश्चितता बढ़ गई है। पिछले 20 वर्षों के दौरान अप्रैल व मई महीने में वर्षा की मात्रा बढ़ गई है। इसका नकारात्मक असर यह पड़ा है कि गेहूं की फसल बुरी तरह प्रभावित हो रही है, जो इस क्षेत्र की मुख्य रबी फसल है। इस मौसम में अधिकांश वर्षा गरज-तूफान के साथ होती है। नई बात नहीं है, इस मौसम में ओलावृष्टि भी होती है। इस वर्ष मार्च के अंत और अप्रैल की शुरुआत में मुजफ्फरपुर, पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, सारण, शिवहर और मधुबनी जिलों में ओलावृष्टि देखी गई। ऐसी बारिश ने कई जगहों पर गेहूं की फसल को गिरा दिया और दानों को बिखेर दिया। इसके अलावा कई स्थानों पर तेज हवा के चलते आम और लीची के कोमल नए फल भी गिरे हैं। अनेक प्रखंडों में मार्च एवं अप्रैल 2023 में बेमौसम बरसात और ओलावृष्टि से गेहूं में 15 से 80 प्रतिशत नुकसान की सूचना है।
अगर पीछे मुड़कर देखें, तो 7 अप्रैल, 2018 को उत्तर बिहार के कई जिलों में हुई ओलावृष्टि सबसे विनाशकारी थी। पूर्वी चंपारण, सीतामढ़ी, गोपालगंज, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, दरभंगा और वैशाली जिले गंभीर रूप से प्रभावित हुए थे। तब इन जिलों की करीब 50 फीसदी गेहूं की फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई थी। मगर प्रतिकूल स्थितियों के बावजूद ध्यान देने की बात है कि बिहार में चलाई गई योजना- जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम- रामबाण साबित हो रही है और यहां के किसान मौसम की मार के बावजूद अच्छी फसल, अच्छी उत्पादकता ले रहे हैं। गेहूं, मक्का आदि की उत्पादकता विपरीत स्थितियों के बावजूद बढ़ी है। कृषि विकास दर बढ़ाने में सरकारी प्रयास व जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम में सहभागिता को सर्वोपरि माना जा रहा है। जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम वर्ष 2019 से आठ जिलों और 2020 से शेष 30 जिलों के 190 गांवों में करीब 60 हजार एकड़ क्षेत्र में चलाए जा रहे हैं।
आज चक्र आधारित कृषि-प्रणाली को समयबद्ध तरीके से और जलवायु अनुकूल कृषि तकनीक के साथ लागू करना जरूरी है। कृषि केंद्रों से जुड़कर ऐसे आजमाए गए तरीके किसानों को सीखने पड़ेंगे, ताकि कम लागत में अधिक उत्पादन हासिल हो सके। कृषि कोई ऐसा मोर्चा नहीं है, जहां हम हार मान जाएं। किसानों को निराशा से दूर रहते हुए समय अनुकूल कृषि तौर-तरीके सीखने पड़ेंगे। अच्छी बात है, कृषि कार्यक्रम में मिल रही सफलता और भविष्य में खाद्यान्न की बढ़ती मांग को देखते हुए सरकार चौथे कृषि रोड मैप में इस योजना को और बड़े रूप में लाने की सोच रही है।