एससी एसटी वर्ग की जमीन बिक्री से परमिशन की बाध्यता समाप्त करना सराहनीय निर्णय :- राजू आर्य

एटा।उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा एससी एसटी वर्ग के लोगों की जमीन विक्रय करने के लिए डीएम से अनुमति प्राप्त करने की प्रक्रिया को समाप्त किये जाने के आदेश को लोकप्रिय पहलू बताते हुए भारतीय किसान यूनियन (भानु) के राष्ट्रीय संगठन मंत्री रंजीत कुमार आर्य ने जन हितेषी करार दिया है।

कट्टर हिन्दूवादी किसान नेता राजू आर्य ने जोर देते हुए कहा है कि उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दलित वर्ग की पीड़ा को नजदीक से समझा है और उनकी निजी जमीन पर उन्हीं को क्रय विक्रय के अधिकार से वंचित किए जाने वाले कानून को समाप्त करके समान रूप से न्याय दिए जाने का कार्य किया है जो बेहद सराहनीय है।
राजू आर्य ने इस संबंध में दीक्षित टाइम्स से अपनी राय साझा करते हुए कहा है कि संबंधित वर्ग के लोगों की जानलेवा जरूरतों को पूरी करने के लिए कलेजा जैसा टुकड़ा कहे जाने वाले जमीन की बिक्री अब पूरे मूल्य पर हो सकेगी। इससे पूर्व इस जमीन से संबंधित व्यक्ति द्वारा बिक्री किए जाने हेतु परमीशन की वजह से खरीदार ढूंढने से नहीं मिलते थे। यदि खरीदार मिल भी जाते थे तो उस जमीन को ओने पौने दामों में खरीद कर दलित समाज के लोगों का भारी शोषण होता था।

एससी एसटी वर्ग की जमीन की बिक्री हेतु परमिशन दिए जाने के नाम पर संबंधित अधिकारियों द्वारा मोटी रकम वसूल की जाती थी। प्रदेश के लोकप्रिय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने दलित वर्ग की समस्याओं और मजबूरियों व पीड़ा को नजदीकी से परखने के उपरांत उनकी जमीन बिक्री करते वक्त परमीशन की बाध्यता समाप्त करने का निर्णय लिया है, जिससे एससी एसटी वर्ग के लोगों को अपनी जमीन बिक्री करते समय वाजिब कीमत प्राप्त हो सकेगी। और जमीन बेचते बक्त प्रशासन स्तर पर उनका आर्थिक उत्पीड़न भी नहीं हो सकेगा। वही खरीदार भी संबंधित अधिकारियों के हाथों ठगने से बचा रहेगा।

किसान नेता राजू आर्य ने अपने निजी अध्ययन पूर्ण निष्कर्ष के आधार पर बयान जारी करते हुए कहा है कि गांव प्रत्येक किसान अपनी जमीन का टुकड़ा जान से ज्यादा महत्वपूर्ण समझता है। और उसे बेचने के लिए किसी भी कीमत पर तैयार नहीं होता। कृषक के सामने जब उसकी अथवा उसके किसी परिजन की जान खतरे में हो या फिर उसकी बेटी शादी योग्य हो गरीबी की वजह से यह कार्य नहीं हो पा रहे हो तब मजबूरी में वह जमीन बेचने का साहस जुटाता है। इससे पूर्व की सरकारों ने दलित समाज के कृषकों की मजबूरी का अध्ययन कभी नहीं किया। और मनमाने तरीके से उनकी जमीन पर तानाशाही के अधिकार का इस्तेमाल जारी रखा जो समाज हित में व्यवहारिक नहीं था।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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