राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक और मीडिया चैनल का किया गया भारत सरकार द्वारा मुंह बंद

अग्निवीर स्कीम और वन रैंक वन पेंशन के खिलाफ पूर्व सैनिकों के मोर्चे से केंद्रीय सरकार के ऊपर मिसाइलों से किया जंतर मंतर से चौतरफा प्रहार

मिसाइलों के बौछार से भारत सरकार हुई गूंगी और बहरी

राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक और मीडिया चैनल का किया गया भारत सरकार द्वारा मुंह बंद

पूर्व सैनिकों का दूसरा जत्था विभिन्न अंचलों से 11 मार्च की रात को होगा छावनी में तब्दीलऔर 12 मार्च जंतर मंतर बनेगा वन रैंक वन पेंशन का युद्ध स्थल

12 मार्च को जंतर मंतर के अंदर पूरी ताकत के साथ पूर्व सैनिकों का जत्था करेगा भारत सरकार के साथ निर्णायक युद्ध
कैप्टन राज द्विवेदी वरिष्ठ उपाध्यक्ष भारतीय मीडिया फाउंडेशन सैनिक फोरम की कलम से
भारतीय मीडिया फाउंडेशन सैनिक फोरम पिछले महीनों से जंतर मंतर के अंदर हो रही उन तमाम गतिविधियों को अच्छी तरह से कवर करते हुए भारत सरकार को समय समय पर आगाह कर आगे की गतिविधियों के बारे में पूर्ण जानकारी दे रहा है कि भारत सरकार कुंभकरण की नींद से जागेगी और भारतीय पूर्व सैनिकों के डिमांड को पूरा करेगी लेकिन भारत सरकार का रवैया पूर्व सैनिकों के साथ बिल्कुल गलत रहा है केवल सिविल पुलिस को भेज देने से अथवा आंदोलनकारियों को पुलिस स्टेशन अथवा जेल भेजने से काम नहीं बनेगा!
याद रखना जब कोई भी पूर्व सैनिक भारतीय संविधान के तहत अपने आवाज को बुलंद करता है तो उसकी आवाज पूरी भारतीय सेना के मानस पटल पर अंकित हो जाती है और एक एक एक जवान सोशल मीडिया के माध्यम से यह जानकारी प्राप्त कर रहा है कि जो पूर्व सैनिक संगठन जंतर मंतर के अंदर आंदोलन कर रहे हैं और अपने डिमांड भारत सरकार से कर रहे हैं और सोशल मीडिया के माध्यम से आवाज उठा रहे हैं वह बिल्कुल सही कर रहे हैं यह आवाज पूरे भारतीय सेना के उन तमाम यूनिट और रेजिमेंट के अंदर भी पहुंच रही है और वह सभी जानते हैं कि यह लड़ाई उन सभी भारतीय सैनिकों को वरदान सिद्ध होगी !
भारतीय पूर्व सैनिकों द्वारा जो जायज मांगे कि जा रही हैं उसके लिए भारत सरकार का एक प्रतिनिधिमंडल जंतर मंतर पहुंचकर पूर्व सैनिकों के संगठनों के अध्यक्षों से बात क्यों नहीं कर रहा है ?
आखिर इसके पीछे भारत सरकार की क्या रणनीति है यह समझ में नहीं आ रही है ?
इसी विषय को आगे बढ़ाते हुए जो बचे हुए पूर्व सैनिक अपने अपने घरों से अथवा सोशल मीडिया के माध्यम से इस आंदोलन को आगे बढ़ा रहे थे अब 12 मार्च को पूरे भारतवर्ष से विभिन्न अंचलों से पूर्व सैनिक 11 मार्च की रात और 12 मार्च की सुबह तक जंतर मंतर में पहुंच रहे हैं जो वन रैंक वन पेंशन की मांग पूरी जोर से उठाएंगे ! प्रश्न उठता है कि क्या भारत सरकार पूर्व सैनिकों को रोक पाएगी क्योंकि आक्रोश और यह जज्बा और यह यक्ष प्रश्न भारत सरकार की नींद उड़ा देगा?

गौरतलब है कि जो पूर्व सैनिक इस आंदोलन का हिस्सा नहीं बन पा रहे हैं वह कहीं न कहीं अपने साथियों को सपोर्ट अवश्य कर रहे हैं क्योंकि एक साथ 25 लाख से ऊपर पूर्व सैनिक जंतर मंतर नई दिल्ली नहीं पहुंच सकते हैं लेकिन सोशल मीडिया के माध्यम से एकीकृत हो चुके हैं और अब दूसरा जत्था 12 मार्च को विभिन्न संगठनों के लोगों के साथ वहां पहुंचेगा इससे साफ जाहिर है कि लड़ाई निरंतर जारी रहेगी क्योंकि यह लड़ाई भारतीय सैनिकों के हित के लिए लड़ी जा रही है यह लड़ाई भारत के उत्थान के लिए और भारतीय सेना की मजबूती के लिए लड़ी जा रही है गौरतलब है कुछ ऐसे रूल और रेगुलेशन अभी भी भारतीय सेना के अंदर जो अंग्रेजों द्वारा बनाए गए थे और अंग्रेजों के समय में उसको पारित किया जाता था वह आज भी चल रहा है लेकिन अब हमारा देश स्वतंत्र हो चुका है स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात 15 अगस्त 1947 से हमारा देश स्वतंत्र हुआ और जब हमारा देश स्वतंत्र हो चुका है तो उन कानूनों को सेना के अंदर क्यों लागू किया जा रहा है जो अंग्रेजों द्वारा अपने हित के लिए भारतीय सैनिकों के बर्बरता के लिए भारतीय सैनिकों के लक्ष्य को बर्बाद करने के लिए उनको तंग करने के लिए बनाया गया था अब हमारी भारतीय सेना में हमारे भारत के लोग भारतीय संविधान के आधार पर भर्ती होते हैं इसलिए संसद के अंदर उन तमाम कानूनों को रद्द किया जाए जो भारतीय सैनिकों के हित में नहीं है और जो मांगे हमारी भारतीय सेना के पूर्व सैनिक कर रहे हैं जिन्होंने भारतीय सेना के अंदर लंबी पारी खेली है उनके अंदर जोश है जुनून है जज्बा है और वह भारतीय सेना को मजबूती प्रदान करने के लिए अपनी आवाज उठा रहे हैं क्योंकि भारतीय सेना के अंदर कोई भी जवान अपना मुंह नहीं खोल सकता है और जब सेवानिवृत्त के बाद भारत सरकार को यह सब चीज पूर्व सैनिक बता रहे हैं तो उस पर अमल करना बहुत जरूरी है !
आप एक ऐसी स्कीम लाइए जो ऑफिसर और जवानों को एक जैसा तनख्वाह और एक जैसा पेमेंट और एक जैसी सुविधा मिले इसमें ऊंच-नीच का भेदभाव बिल्कुल खत्म करना चाहिए !
सेना एक परिवार की तरह काम करती है सेना के अंदर अनुशासन है सेना के अंदर एक फैमिली रिलेशन है पिछली लड़ाई में हमारे सैनिकों ने कितने अफसरों की जान बचाई है और अपनी जान जोखिम में डालकर अपना सर्वोच्च न्योछावर कर दिया क्योंकि हम एक परिवार की तरह वहां पर काम करते हैं हमारा एक ही लक्ष्य है दुश्मन को बर्बाद करना और भारतीय तिरंगे की आन बान शान को बरकरार रखना हमारा तिरंगा कहीं झुकने ना पाए भारतीय पूर्व सैनिक उसी भारतीय सेना से सेवानिवृत्त हुए हैं जो आज हमारी भारतीय सेना अपनी परंपरा को कायम रखे हुए हैं भारतीय सेना लोगों को जीना सिखाती है भारतीय सेना आम पब्लिक की मदद करती है उनकी जान बचाती हैं भारतीय सेना विषम परिस्थिति के अंदर भी भारत की एकता और अखंडता और तथा भारत की सहिष्णुता को कायम रखती है भारतीय सेना के अंदर एक से बढ़कर एक बहादुर जवान राष्ट्रीय तिरंगे की आन बान शान के लिए मरते हैं वहीं जवान आज जंतर-मंतर के अंदर गूंगी और बहरी सरकार को जगाने का प्रयास कर रहे हैं क्या यही लोकतंत्र है ?
क्या लोकतंत्र के अंदर आवाज उठाना गुनाह है ?अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है भारत सरकार को चाहिए कि एक प्रतिनिधिमंडल भेजकर जंतर-मंतर के अंदर उन तमाम सैनिक संगठनों के साथ बातचीत करें और उसके पश्चात इस विषय को बड़ी गंभीरता से एक कमेटी बनाकर पूर्ण रूप से समस्या का हल करने का प्रयास करें निश्चित रूप से समस्या का हल होगा और भारतीय पूर्व सैनिकों के द्वारा उठाई गई मांगों को भारत सरकार बहुत अच्छी तरह से हल कर सकती है!
लेकिन यह समझ में नहीं आ रहा है कि भारत के प्रधानमंत्री इस विषय के प्रति सजग क्यों नहीं हो रहे हैं जबकि वह हमेशा दिवाली दशहरा होली के दिन भारतीय जवानों के बीच में पहुंचकर अपने आपको पाते हैं ?
केवल एक वर्ग को खुश कर देने से दूसरा वर्ग जब नाराज होता है तो भारतीय सेना की परंपरा में कहीं न कहीं काला धब्बा लग रहा है !
भारतीय सेना के इतिहास में भारतीय सैनिक कभी कुछ नहीं मांगे हैं जो उनको दे दिया जाता था उसमें वह संतुष्ट होकर अपने परिवार का पालन पोषण करते थे लेकिन अब जमाना बदली हो चुका है अब इस जमाने के अनुसार भारतीय सेना की परंपरा को भी चार चांद लगाने होंगे और वर्तमान समय में जो जंतर मंतर से उठ रही आवाज पूर्व सैनिकों द्वारा भारत सरकार को जगाने के लिए की जा रही है वह बिल्कुल जायज है और इसके लिए भारतीय मीडिया फाउंडेशन ने पहले ही आवाज उठाया था जब जंतर मंतर से पूर्व सैनिकों की आवाजें निकल रही थी तब से भारतीय मीडिया फाउंडेशन भारतीय पूर्व सैनिकों के साथ में है और उनकी दावेदारी को सोशल प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में जगह दे रहा है क्योंकि भारतीय सैनिक कभी पीछे नहीं रहते हैं जब वह अपना किसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एक साथ चल पड़ते हैं तो उनके साथ भारतीय तिरंगा झंडा भी साथ में रहता है जो आन बान शान का प्रतीक है फौजी कभी झुकता नहीं है कभी डरते नहीं है उनका एक ही काम है अपने लक्ष्य को प्राप्त करना !
इसलिए आने वाले भविष्य में जो हमारे युवा वर्ग है स्कूली बेटे और बेटियां हैं जहां नेशनल कैडेट कोर है वह हमारे भारतीय सेना की परंपरा है स्कूलों और कालेजों में अनुशासन है वह हमारे जांबाज जवानों की वजह से आज भारत के अंदर एनसीसी के माध्यम से बच्चों को एकता और अनुशासन का पाठ पढ़ाते हैं वहीं दूसरी ओर जब युद्ध होता है तो अपने बल का अपनी ताकत का इजहार सीमा पर करते हैं जहां दुश्मन हमेशा उनसे हारा है यह इतिहास आप और हम सभी को मालूम है इसी के साथ साथ हमारे जवान विषम परिस्थिति में भी अपना सहयोग प्रदान करते हैं आपको याद होगा जब कोई लड़का बोर के अंदर गिर जाता है और पूरी तरह से सिविल प्रशासन फेल हो जाता है तब वह हमारे जवानों को याद करता है फौज को याद करता है जब कोई बाढ़ विभीषिका में फंस जाता है बाढ़ के अंदर किसी पेड़ के ऊपर टंगा पाया जाता है उस बच्चे को उस बूढ़े को उस उस बालक को उस महिला को निकालने के लिए भारतीय सेना आती है और अपनी जान जोखिम में डालकर उसको हेलीकॉप्टर के माध्यम से उसके घर तक सकुशल लेकर जाती है और हमारे देशवासी अच्छी तरह से भारतीय सेना को जानते हैं कि हमारी सेना भारत की एकता और अखंडता के लिए पूरी तरह से न्योछावर है सवाल उठता है कि जब हमारी भारतीय सेना पूरी लाव लश्कर के साथ आम पब्लिक की जाने बचाती हैं उनको सुख पहुंचाती हैं और अपने देशवासियों की रक्षा करती है तो फिर उनकी मांग को पूरा करना क्या सही नहीं है ?
क्या भारत सरकार के पास में इस समस्या का हल करने के लिए उनके पास समय नहीं है? क्या भारत सरकार गूंगी और बहरी बन चुकी है ?
भारतीय मीडिया फाउंडेशन जंतर मंतर से उठ रही पूर्व सैनिकों की आवाजों को आम पब्लिक के बीच और सरकार के कानों तक भेजने का काम कर रहा है और हमेशा ऐसे आवाज को बुलंद करेगा जो देश समाज और राष्ट्र हित होगी!
भारतीय सेना अपने सीमाओं की चौकसी के लिए भारत की आंतरिक और बाहरी व्यवस्था को ठीक करने के लिए भारत की एकता के लिए देश की अखंडता के लिए देश की सुरक्षा के लिए बनाई गई है और भारतीय सेना की परंपरा और उसकी इतिहास के पन्ने जो स्वर्ण अक्षरों से लिखे जा चुके हैं पता चलता है कि हमारी बहादुर सेना किस प्रकार से विश्व युद्ध से लेकर आज तक भारतीय सेना को गौरवशाली परंपरा के साथ-साथ गौरवशाली इतिहास रचा है !
लेकिन यह बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि भारतीय सैनिकों के मांगों को लेकर जब आवाज उठती है तो फिर भारतीय सरकार अथवा केंद्र सरकार अथवा रक्षा मंत्रालय उनकी आवाजों को कुचलने के लिए गूंगी और बहरी क्यों बन जाती है ?
क्या चुप रहने से पूर्व सैनिक अथवा सैनिक अपना मुंह बंद कर लेगा?
सेना में एक बहुत बड़ा अनुशासन है और सैनिक कभी मांगते नहीं है बल्कि सैनिकों को दिया जाता है पूरे विश्व के इतिहास में जिस कंट्री की सेनाएं अपने डिमांड को लेकर अपने सरकार के पास जाती है वह देश कभी आगे नहीं बढ़ता बल्कि उसके घर के अंदर दीवारें पैदा हो जाती हैं और विश्व के अंदर उनका स्थान बहुत पीछे रह जाता है इसलिए भारतीय मीडिया फाउंडेशन भारत सरकार से अपेक्षा करता है कि इस समस्या को हल करने के लिए अपने उन तमाम रक्षा मंत्रालय के चुनिंदा लोगों को आगाह करते हुए निर्देशित करें और इस विषय को जंतर मंतर के अंदर जाकर पूर्व सैनिकों के साथ बातचीत करें जिससे भारतीय सेना की परंपरा कायम रहे और जो अनुशासन हमारे पूर्व सैनिकों और सेवारत सैनिकों का रहा है वह बरकरार रहे इसमें भारत सरकार और भारतीय सेना की इज्जत और प्रतिष्ठा का प्रश्न है इसलिए भारत सरकार को इस विषय पर बहुत जल्दी अपना विचार प्रकट करना होगा!

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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