क्यो बिपक्ष इतना तूल दे रहा था,किसी बेगुनाह को फ़साने के लिए
मृत्यु पूर्व बयान पर संदेह ने कराया बरी
हाथरस में गुरुवार को बूलगढ़ी कांड के फैसले को लेकर कोर्ट में गहमा गहमी

मजिस्ट्रेटी बयान पीड़िता के मृत्यु पूर्व बयान थे, जो कि मुकदमे के अहम साक्ष्य
बूलगढ़ी कांड में सीबीआई, एसआईटी और दिल्ली के चर्चित निर्भया कांड का केस लड़ने वाली अधिवक्ता सीमा कुशवाह की सारी कसरत बेकार हो गई। इस घटना में शुरुआती दौर में जहां पुलिस पर लापरवाही पूर्ण विवेचना करने और पीड़िता का मेडिकल कराने से लेकर अन्य विधिक प्रक्रिया अपनाने तक में लचर रवैया अपनाया। वहीं, मेडिकल और फॉरेंसिक साक्ष्य लेटलतीफी की वजह से कमजोर होते गए। वहीं, मजिस्ट्रेट बयान दर्ज करने में भी लापरवाही हुई। मजिस्ट्रेटी बयान पीड़िता के मृत्यु पूर्व बयान थे, जो कि मुकदमे के अहम साक्ष्य थे। मगर, अलीगढ़ तहसील में उस वक्त तैनात रहे नायाब तहसीलदार मनीष कुमार की लापरवाही से यह बयान कोर्ट में संदेहस्पाद साबित हुए। इस आधार पर कोर्ट ने इन्हें नकार दिया और तीन आरोपी बरी हो गए।
पीडब्लू-6 के तौर पर नायब तहसीलदार मनीष कुमार को कोर्ट में अभियोजन पक्ष ने पेश किया। यहां मनीष कुमार ने अपनी प्रतिपरीक्षा में कहा कि उन्हें हास्पीटल जाने से पूर्व मृत्युपूर्व बयान अंकित करने के लिये किसी अधिकारी द्वारा कोई लिखित गोपनीय मेमो नहीं दिया गया था। 22 सितंबर 2020 को तत्कालीन एसडीएम कोल द्वारा मौखिक निर्देश फोन द्वारा दिए गए। मृत्युपूर्व बयान लिखने के लिए उन्होंने स्वयं जेएन मेडिकल कॉलेज जाकर मेमो प्राप्त किया। नायब तहसीलदार ने अपने बयानों में कोर्ट में जिरह के दौरान स्वीकार किया कि यह सही है कि मृतका का मृत्यु पूर्व बयान लिखे जाने के पश्चात डॉक्टर द्वारा दिए गए प्रमाण पत्र के उपरांत भी उसका अंगूठा निशान नहीं लिया गया। यह भी कहा कि उन्हें याद नहीं है कि बयान लेने के दौरान युवती आईसीयू में थी या फिर जनरल वार्ड में। साथ ही स्वीकार किया कि उन्होंने बयान लिखने के बाद उनको मौके पर सील नहीं किया था। बयान लेने के बाद वह अपने ऑफिस चले गए। वहां उन्हें सील किया।
नायाब तहसीलदार ने यह भी स्वीकार किया कि उन्होंने बयान ऑफिस में सील करने के बाद उसी दिन न्यायालय में प्रस्तुत नहीं किए। इसके अलावा कोर्ट में जिरह के दौरान यह भी स्वीकारा कि मृत्युपूर्व बयानों से पहले मृतका के परिजन वार्ड में मौजूद रहे थे। बयान अंकित करने के समय उनको तैयार नहीं किया था। बल्कि बाद में सीएमओ ऑफिस जाकर बयानों को तैयार किया था। उस समय वहां मृतका नहीं थी। यहां तक की उन्होंने जिरह के दौरान कोर्ट में यह भी स्वीकारा कि पीड़िता ने बयान में बलात्कार की बता बताई थी या नहीं उनको स्पष्ट नहीं। नायाब तहसीलदार ने यह सभी बातें बचाव पक्ष द्वारा की गई जिरह में स्वीकार की, जिससे बचाव पक्ष मृत्यु पूर्व बयानों को संदेहस्पाद साबित करने में सफल रहा और तीन आरोपी कोर्ट से बरी हो गए।
रामू, रवि और लवकुश साक्ष्य के अभाव में बरी।