साहित्य जीवन की आलोचना है : प्रो0 श्रद्धानंद

साहित्य जीवन की आलोचना है : प्रो0 श्रद्धानंद

तथ्यों के सही प्रस्तुतीकरण के लिए शोधकर्ता को पूर्वाग्रह से बचना चाहिए : प्रो0 आर0 पी0 सिंह।

,वाराणसी। मानविकी विषय के शोधकर्ता की विषय वस्तु देखने की अपनी अन्तर्दृष्टि होती है। मानविकी से ज्ञान का कोई पहलू अछूता नहीं है। अध्ययनशील व्यक्ति ही समाज के लिए उपयोगी शोधकार्य कर सकता है। मानविकी के शोध में समाज के समग्र विकास को ध्यान में रखना आवश्यक है। एक अच्छे शोध लेखन के लिए भाषा का ज्ञान आवश्यक है। अपने उद्द्बोधन में आपने बताया कि साहित्य जीवन की आलोचना है l साहित्य मनुष्यता की बात करता है l साहित्य हमें समय – समय पर शक्ति भी देता है l आपने पूरे वक्तव्य में मनुष्यता, मानवता, प्रेम, भाई चारा की पुरजोर वकालत की l उक्त बातें प्रो0 श्रद्धानंद ने मानविकी संकाय, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के शोध संवाद सभा द्वारा आयोजित मानविकी के विषयों में शोध के विविध आयाम” विषयक एक दिवसीय संगोष्ठी में बतौर अध्यक्षीय उद्बोधन में कहीं l
मुख्य वक्ता प्रो0 रणधीर प्रताप सिंह ने कहा कि मानविकी विषय में शोध का मुख्य उद्देश्य मनुष्य में मानवीय मूल्यों का विकास करना होता है। मानविकी के शोध विश्व बंधुत्व के प्रमुख आधार हैं। तथ्यों के सही प्रस्तुतीकरण के लिए शोधकर्ता को पूर्वाग्रह से बचना चाहिए। कोई भी शोध अंतिम शोध नहीं होता है, किसी भी शोध में नया करने की संभावना हमेशा बनी रहती है। किसी भी विषय के शोधकर्ता को चरित्रवान एवं अध्ययनशील होना आवश्यक है। विचार व्यक्त करते हुए डॉ0प्रभा शंकर मिश्र ने कहा कि शोधकार्य करने वाले व्यक्ति में जिज्ञासा होना आवश्यक है। शोध आंख-कान खोलकर चलने की प्रक्रिया है। संगोष्ठी के समन्वयक प्रो0 अनुराग कुमार ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि शोध ज्ञान में डूबने और खोजने की जिजीविषा का विषय है। इसलिए शोध पाठ्यक्रम तक ही सीमित नहीं होना चाहिए। शोधकर्ता को देश,काल, परिस्थिति का ज्ञान होना आवश्यक है। मानविकी के शोध में परम्परा एवं आधुनिकता का समन्वय होना चाहिए। किसी भी शोध में नया करने के लिए शोधकर्ता में साहस का होना आवश्यक है।
अतिथियों का वाचिक स्वागत संगोष्ठी के सह-संयोजक डॉ0 विनोद कुमार सिंह ने किया। संचालन आयोजन सचिव डॉ0सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ0 मनोहर लाल ने किया। संगोष्ठी का संयोजन डॉ0 दीपक कुमार ने किया l
संगोष्ठी का उद्घाटन अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलित कर एवं संस्कृत विभाग के छात्रों द्वारा मंगलाचरण प्रस्तुत कर किया गया।
इस अवसर प्रो0राजेश मिश्र, प्रो0 नलिनी श्याम कामिल, प्रो0 रामाश्रय सिंह, प्रो0 अनुकूल चन्द्र राय, प्रो0 दानपति तिवारी, पी आर ओ डॉ0 नवरत्न सिंह, डॉ0 सुनील कुमार विश्वकर्मा, डॉ0 निशा सिंह, डॉ0 संगीता घोष, डॉ0अनिता, डॉ0 नीरज , डॉ0 सीमा यादव, डॉ0दिनेश चन्द्र शुक्ल, डॉ0शत्रुघ्न प्रसाद, डॉ0 रेयाज अहमद, डॉ0 ज़ावेद ,शोध छात्रों में दीपक, मनीष, वागीश, प्रवीण, बलिराम, आकाश, किशन, सुशील, वंदना , मीरा, गजेंद्र, रमेश, मंजू, धर्मेंद्र,नीतू के साथ हिन्दी, संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, पत्रकारिता, दर्शनशास्र के शोध छात्र/ छात्राएं उपस्थित रहे ।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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