भगवान श्री रामकृष्ण देव की 187वीं शुभाविर्भाव तिथि धुमधाम से मनाई

फाल्गुन शुक्ल द्वितीया तिथि को हर्षोल्लास के साथ अवतार वरिष्ठ भगवान श्री रामकृष्ण देव की 187वीं शुभाविर्भाव तिथि धुमधाम से मनाई गयी।

लक्सा स्थित रामकृष्ण अद्वैत आश्रम में आज भारतीय पंचागानुसार फाल्गुन शुक्ल द्वितीया तिथि को हर्षोल्लास के साथ अवतार वरिष्ठ भगवान श्री रामकृष्ण देव की 187वीं शुभाविर्भाव तिथि धुमधाम से मनाई गयी। प्रातः 4 बजे मंगलारती के पश्चात वेद पाठ व उषा कीर्तन किया गया।

प्रातः 6 बजे से स्वामी अलोकानन्द जी के द्वारा विशेष पूजा, अभिषेक व हवन हुआ। प्रातः स्वामी शास्त्रविदानन्द जी द्वारा कीर्तन तथा स्वामी धरणीधरानन्द जी के द्वारा श्री रामकृष्ण महिमा पर संगीतमय प्रवचन हुआ। संध्या 4 बजे धर्म सभा का आयोजन किया गया जिसमें उद्बोधन संगीत डाॅ स्वामी दयापूर्णानन्द जी ने किया। स्वामी अलोकानन्द जी ने संस्कृत में वक्तव्य रखते हुए कहा कि भगवान श्रीरामकृष्ण ने भक्ति का वास्तविक स्वरूप जन- साधारण के सम्मुख रखा और बुद्धिवादियों की मान्यता का प्रवाह ही बदल दिया। इसी तथ्य को उन्हें व्यापक भी बनाना था और आस्तिकता की उपासना की यथार्थता का परिचय देकर फिर से भक्ति भावना की यथार्थता तथा परिणित सिद्ध करना था। यही उन्होंने जीवन भर किया भी।

दूसरे वक्ता के तौर पर उपस्थित स्वामी भेदातीतान्द जी ने बंगला भाषा में अपने वक्तव्य में श्रीरामकृष्ण को मानवता के पुजारी बताते हुए कहा कि साधना के फलस्वरूप वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि संसार के सभी धर्म सच्चे हैं और उनमें कोई भिन्नता नहीं। अध्यक्षता करते हुए रामकृष्ण अद्वैत आश्रम के अध्यक्ष स्वामी विश्वात्मानन्द जी ने कहा कि श्रीरामकृष्ण की आध्यात्मिक आंदोलन ने परोक्ष रूप से देश में राष्ट्रवाद की भावना बढ़ाने का काम किया, क्योंकि उनकी शिक्षा जातिवाद एवं धार्मिक पक्षपात को नकारती है। धर्मसभा में अन्नदा देवी गुरुकुल संस्कृत महाविद्यालय की शाश्वती दत्ता ने संस्कृत में अपना वक्तव्य रखा वहीं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्ययनरत अर्थशास्त्र के छात्र अंकित कुमार ने हिन्दी में सभा को सम्बोधित किया। धर्मसभा का कुशल संचालन उत्कर्ष चौबे ने किया जबकि धन्यवादज्ञापन स्वामी हरिकृपानन्द ने किया ।

संध्या आरती के पश्चात सामूहिक कीर्तन हुआ। मध्याह्न 12 बजे से भोग-प्रसाद की व्यवस्था की गई थी जिसमें लगभग 3200 लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

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