कोरोना से आखिर कबतक जंग जारी रहेगी, रिपोर्ट योगेश मुदगल

दुनिया से कोरोना की चिंता खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। वैज्ञानिक इस विचार-मंथन में लगे हैं कि क्या हर साल कोरोना वैक्सीन लेने की जरूरत पड़ेगी? विशेष रूप से अमेरिकी वैज्ञानिक इस पर ज्यादा गंभीरता से विचार कर रहे हैं। अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने प्रस्ताव दिया है कि इन्फ्लूएंजा के टीकों के साथ ही कोविड-19 के टीकों को भी अपडेट किया जाए। क्या कोरोना के टीकों को अपडेट करने की जरूरत है? अनेक वैज्ञानिक यह मानते हैं कि ऐसा जरूरी नहीं है, जबकि अनेक वैज्ञानिक इसे भी वार्षिक स्तर पर अपडेट करते चलने के पक्ष में हैं। चूंकि कोरोना अभी भी काबू में नहीं आया है, इसलिए उसके खिलाफ टीकों को भी जारी रखने पर कमोबेश सहमति है। भारत में वैक्सीन को लेकर एक तरह से खामोशी का आलम है, पर अमेरिका में वैक्सीन या टीकों का विषय बहुत नियोजित है। वहां लगातार यह कोशिश होती रहती है कि टीकाकरण को निरंतर सरलीकृत किया जाए। वैसे पहले भी वैज्ञानिकों ने यह चर्चा की है कि कुछ-कुछ समय पर वैक्सीन की जरूरत पड़ेगी। कोरोना वैक्सीन शरीर में कब तक कारगर रहता है, इस पर भी वैज्ञानिक एकमत नहीं हैं, तो इससे भी नीति निर्माण में बाधा आ रही है।
एक बार जब वैज्ञानिक पूर्ण रूप से सहमत हो जाएंगे, तब वयस्कों को फिर वैक्सीन दोहराने के लिए कहा जाएगा। अमेरिका ने अगर ऐसा किया, तो इसका असर दुनिया के बाकी देशों पर भी पड़ेगा। यह समस्या गंभीर है। अभी हम भारतीय इसे समझ नहीं रहे हैं, क्योंकि भारत में कोरोना के सक्रिय मामले 2,000 से भी कम हो गए हैं, जबकि अमेरिका में 17 लाख से ज्यादा सक्रिय मामले हैं। दुनिया में सबसे ज्यादा सक्रिय मामलों के साथ जापान अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। चीन अपने यहां सक्रिय मामलों को एक लाख 18 हजार के करीब ही बता रहा है। दक्षिण कोरिया, जर्मनी, ब्राजील और एक बार फिर इटली में संक्रमण का नया दौर चल रहा है। यह संतोष की बात हो सकती है कि अब जान गंवाने वालों की संख्या घटी है। तब भी दुनिया में रोज हजार से ज्यादा लोग कोरोना की वजह से जिंदगी हार जा रहे हैं। ऐसे में, कोरोना को हल्के में नहीं लिया जा सकता। दुनिया में दस से ज्यादा ऐसे देश हैं, जिनकी स्थिति देखते हुए कोरोना को अभी भी महामारी ही कहा जाना चाहिए।
पेन्सिलवेनिया में चिल्ड्रन हॉस्पिटल ऑफ फिलाडेल्फिया की वैक्सीन विशेषज्ञ एंजेला शेन का कहना है कि कोरोना वैक्सीन संबंधी प्रस्ताव वैचारिक रूप से बुरा नहीं है। हालांकि, लगे हाथ वह सवाल भी करती हैं कि क्या आंकड़े यह तस्दीक करते हैं कि हर साल कोरोना वैक्सीन की खुराक जरूरी है? अमेरिकियों ने अपने यहां फ्लू के व्यवहार को तो समझ लिया है, लेकिन कोविड को समझना शेष है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, फ्लू, मर्स, इबोला के हमले विगत दशकों में तेज हुए हैं। अच्छी बात है कि वैज्ञानिक हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठे हैं। सांस संबंधी रोगों के उपचार पर तेजी से काम हो रहा है। दवा कंपनी मोदेरना ने रेस्पिरेटरी सिंकिटियल वायरस (आरएसवी) के खिलाफ बड़ी कामयाबी की घोषणा की है, तो फाइजर और जीएसके ने भी इससे जुड़ी दवाएं विकसित करके अनुमोदन के लिए पेश की हैं। चीन ने भी एक नए वैक्सीन का खुलासा किया है, जो जल्दी असर करता है। कुल मिलाकर, कोरोना से युद्ध जारी है, हमें भी सतर्क रहकर इसमें योगदान देना चाहिए।