बहुत उड़ते हैं विमान खूब कोलाहल लिए

बहुत उड़ते हैं विमान खूब कोलाहल लिए

इंसानों का शुरू से ही आसमान में उड़ने का बहुत मन करता है। आज से चार सौ साल से भी पहले यूरोप में विलियम शेक्सपियर लिख रहे थे, मेरी आत्मा हवा में है… गरुण की उड़ान भरती हुई, निडर और आगे, पीछे कोई मार्ग न छोड़ती हुई। और ठीक उसी समय भारत में भक्त कवि तुलसीदास श्रीरामचरितमानस में लिख रहे थे, चलत बिमान कोलाहल होई। जय रघुबीर कहइ सबु कोई॥ सिंहासन अति उच्च मनोहर। श्री समेत प्रभु बैठे ता पर॥ संभवत उन्हें पता था कि एक दिन विमान उडे़गा और खूब कोलाहल होगा। मन में भय की सृष्टि भी होगी और तब जय रघुबीर, जय-जय राम उद्घोष करना पड़ेगा।

उसके तीन सौ साल बाद इंसानों ने जब सचमुच विमान उड़ाना शुरू किया, तब भी खूब कोलाहल हुआ, आज भी होता है। खैर, 1909 में पेरिस स्थित ऐतिहासिक एफिल टावर के पास से होते हुए एक विमान गुजरा था। तब सुंदरतम शहर पेरिस के बगीचों, मैदानों और घरों पर गुलाबी धूप खिली हुई थी। सब लोग बाहर निकले हुए थे, सबने देखा, उस 17 वर्षीय स्कूली छात्र ने भी देखा, कोई चीज उड़ती चली आ रही है। वह कोई विशाल पक्षी नहीं है, कोई यंत्र है विशाल, जो शोर करता उड़ा आ रहा है। दृश्य अकल्पनीय और ऐसा अद्भुत था कि पलकें झपकना भूल गईं। बस एकटक नजरों में वह विमान सजा रहा। ऐसा लगता था कि दो आयताकार छप्पर या छतें, ऊपर नीचे, परस्पर लोहे, लकड़ी या प्लास्टिक की पाइपों से जुड़ी हैं। एक इंसान चालक बीच में बैठा है। फर्श और छत के चारों ओर से जोड़ने वाली दीवारें नहीं हैं। अजीब सी चीज है, लेकिन समान ऊंचाई पर उड़ती चली आ रही है। मन में असीम आनंद का ज्वार आ गया और शरीर के रोम-रोम हर्षित मुद्रा में आकाश की ओर बेताब हो उठे। यह भी लग रहा था कि वह विमान कहीं एफिल टावर से न टकरा जाए, पर जब वह पास आया, तब दिखा कि वह टावर से भी ऊपर है। शायद विमान को भी चिंता थी कि कहीं टावर आड़े न आ जाए। ऐसा नजारा न कभी दिखा था, न उम्मीद थी। उम्मीद के पार से वह उड़ता आया था, पक्षियों के गर्व को जवाब देता हुआ कि देखो, इंसान भी अब उड़ सकता है।

उड़ती हुई वह मशीन झलक दिखाकर चली गई, लेकिन उस लड़के के मन में मानो हमेशा के लिए बस गई। यह क्या था, क्यों था, कैसे था? सवाल उमड़ने लगे। पता चला, फ्रांस के एक नागरिक चार्ल्स द लेंबर्ट विमान उड़ा रहे थे, उन्होंने विल्बर राइट से विमान चलाना सीखा था और विल्बर से ही दो विमान खरीदा था। चार्ल्स द लेंबर्ट फ्रांस या यूरोप के पहले इंसान थे, जिन्होंने साल 1908 में विमान उड़ाना शुरू किया था।

फिर क्या था, लड़के ने विमानन के बारे में एक-एक शब्द की सूचनाएं भी जुटानी शुरू कर दी और उसके दिमाग में आधुनिक विमानों का खाका खिंचने लगा। क्या विमान और सुंदर दिख सकता है? क्या उसमें बैठने वाला ज्यादा सुरक्षित हो सकता है? क्या विमान चालक खुले में बैठने से बच सकता हैै? उसने विमानन की हरसंभव पढ़ाई पर ध्यान लगा दिया और जब प्रथम विश्व युद्ध छिड़ा, तब विमानन तकनीक में फ्रांसीसी वायु सेना की मदद को मजबूर हुआ। युद्ध के दुष्प्रभाव ने मुश्किल में डाल दिया। वह यहूदी था, तो नाजियों के हाथों बमुश्किल जिंदगी बची। वह भूमि और कारों के व्यवसाय में लग गया। हालांकि, तब भी जब वह आंखें बंद करता था, तो एफिल टावर के आकाश में उड़ता वही विमान खूबसूरती से खिल आता था। मन बेचैन हो जाता था, पर फिर नाजियों के हाथों दमन के दर्द उभर आते थे। फिर एक दिन आया, शाम का वक्त था, ‘सेंट लुईस की आत्मा’ नाम का एक विमान बॉर्गेट हवाई अड्डे पर करीब से दिखा। इस बार विमान में केवल छत बची थी, जैसे पंख हो और उसके नीचे उससे जुड़ी हुई पक्षी या मछली की आकृति, मतलब विमान का लंबा शरीर। एक वाहन, जिसमें अंदर इंसान बैठ सकता था। यह देख वह खुद को रोक न सका, उसने सोच लिया कि अब नागरिक विमान बनाने के लिए काम करना होगा। विमान का उपयोग सिर्फ युद्ध के लिए ही क्यों हो, लोगों को इससे आने-जाने की सुविधा भी मिलनी चाहिए।

तब इंजीनियर ने अपना नाम बदलकर मार्सेल दसो कर लिया और कंपनी का नाम रखा दसो एविएशन। कंपनी ने कमाल के विमान बनाने शुरू किए। एक से एक खूबसूरत और मजबूत। 22 जनवरी को जन्मे मार्सेल दसो (1892-1986) की कंपनी सौ से ज्यादा प्रकार के 10,000 से ज्यादा विमान 90 से ज्यादा देशों को दे चुकी है। राफेलविमान भी उन्हीं की कंपनी ने भारत को दिए हैं, यह विमान भी जब सैर को निकलता है, तब खूब कोलाहल होता है और दुश्मनों के दिल दहल जाते हैं।

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निशाकांत शर्मा (सहसंपादक)

यह खबर /लेख मेरे ( निशाकांत शर्मा ) द्वारा प्रकाशित किया गया है इस खबर के सम्बंधित किसी भी वाद - विवाद के लिए में खुद जिम्मेदार होंगा

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