
इटावा: चंबल परिवार और दी एंट के तत्त्वावधान में चंबल लिटररी फेस्टिवल का भव्य शुभारम्भ कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया महाविद्यालय में शुरू हुआ। उद्घाटन सत्र “चंबल: इतिहास और संस्कृति” में अपना वक्तव्य रखते हुए भिंड से आए अधिवक्ता और चंबल के इतिहास के लेखक देवेन्द्र सिंह चौहान ने कहा कि चंबल विद्रोह और विद्रोहियों की भूमि है। उन्होंने कहा कि मुगल काल में भी जहांगीर और अकबर को यहां के परिक्षेत्र पर अधिकार करना बहुत कठिन काम हो गया था। अंग्रेजों के शासन काल में यह समूचा परिक्षेत्र अंग्रेजों के लिए चुनौती बना रहा। चंबल परिक्षेत्र के प्राचीन दस्तावेजों में यहां के विद्रोहियों की गाथाएं और उनके दमन की कहानियां दबी हुई हैं। इटावा के एक गांव फांसिया का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि यहां अंग्रेजों ने लगातार दमन चक्र चलाया। बंसरी गांव में तो एक वर्ष तक लोगों ने अपने संसाधनों से क्रांतिकारियों की सहायता की। उन्होंने इसे सैनिकों की नर्सरी भी कहा। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि चंबल के इतिहास को चंबल के स्रोत से जानना चाहिए। रामप्रसाद बिस्मिल, गेंदालाल दीक्षित, जंगली और मंगली आदि विद्रोहियों के आख्यानों से उन्होंने चंबल के पराक्रम को व्यक्त किया। उन्होंने चंबल के परिक्षेत्र को मेधा से परिपूर्ण क्षेत्र भी कहा। पांचवीं शताब्दी में चंबल संभाग के विद्वान परमार्थ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उस समय चीनी शासक ने परमार्थ को सांख्य दर्शन का चीनी अनुवाद और भारतीय दर्शन के बारे में जानने के लिए बुलाया था। देवेन्द्र सिंह चौहान ने चंबल के विभिन्न नदियों के दोआब के भौगोलिक क्षेत्र की विशिष्टताओं को भी अपने व्याख्यान में उद्घाटित किया।
कार्यक्रम में अपना विचार व्यक्त करते हुए क्रांतिकारी कवि और लेखक देव कबीर ने कहा कि स्वाधीनता आंदोलन में सभी वर्ग, समुदाय और वर्णों का सहयोग मिला। इसे किसी विशेष समुदाय और जाति से जोड़कर देखना सम्यक दृष्टि नहीं है।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए डॉ रमाकांत राय ने चंबल के मिथकीय अवधारणा के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि यह नदी अभिशापित कही गई है। इसके तट पर तीर्थ और घाट नहीं हैं और इसके बारे में यह कहा गया है कि इसमें पानी नहीं रक्त संचरित होता है। किंतु अब नए ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में यह मिथ टूट रहा है। इसका नया स्वरूप निर्मित हो रहा है, जो स्वाधीनता संग्राम के रणबांकुरों से जुड़ा हुआ है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्रबंधक वीरभान सिंह भदौरिया ने किया। कार्यक्रम के उद्घाटन समारोह से पूर्व आजादी योध्दा कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित किए और दीप प्रज्वलित कर इस आयोजन को एक महत्त्वपूर्ण पहल कहा। कार्यक्रम के संयोजक डॉ शाह आलम राना ने बताया कि यह प्रयास चंबल को पहचानने का एक उपक्रम है। यहां के इतिहास और संस्कृति तथा साहित्य को सबके समक्ष लाने की कोशिश है। कार्यक्रम में डॉ कमल कुशवाहा, खालिद नाइक, महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ राजीव यादव, कवि विजय सिंह पाल और डॉ कुश चतुर्वेदी समेत बहुत से गणमान्य नागरिक और छात्राओं की उपस्थिति रही।
इससे पहले चंबल लिटररी फेस्टिवल में पोस्टर प्रतियोगिता और रंगोली प्रतियोगिता का आयोजन किया गया, जिसमें कई विद्यालयों के विद्यार्थियों ने सक्रिय भूमिका निभाई। चंबल लिटररी फेस्टिवल में पुस्तक प्रदर्शनी और पोस्टर प्रदर्शनी भी रखी गई थी।
कार्यक्रम का दूसरा सत्र कवि सम्मेलन का था जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ कवि और साहित्यकार डॉ कुश चतुर्वेदी ने की। सम्मेलन में वरिष्ठ कवि विजय सिंह पाल ने अपनी विख्यात कविता मेरी पीर सुनाई। भिंड से पधारे कवि डॉ जितेंद्र बिसारिया ने अपनी विद्रोही कविताओं से विशिष्ट पहचान छोड़ी। युवा कवि गायत्री मिश्र ने अपनी कविताओं से मुग्ध कर दिया। लोकगायक सद्दीक अली, कवि गणेश शर्मा विधार्थी, महेंद्र मिहोनवी, शाहिद महक ने कविता पाठ कर खूब तालियां बटोरी।